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E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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बागेश्वर जनपद के सीमान्त हिमालय का प्राकृतिक सोन्दर्य एवं एतिहासिकता

Author(s) KAMAL SINGH
Country India
Abstract उत्तराखण्ड के सीमान्त हिमालयी क्षेत्र प्राकृतिक सौन्दर्य के रूप में विश्व विख्यात है यह क्षेत्र आदिकाल से ही तपोभूमि रही है माँ नन्दा देवी की इस भूमि में विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक सौन्दर्य हैं इस क्षेत्र को नन्दा देवी क्षेत्र भी कहा जा सकता है क्योंकि यहाँ हर घर में माँ नन्दा भगवती का मंदिर स्थापित है और प्रत्येक वर्ष नंदा भगवती की राजजात एवं छोटी-छोटी जात यात्राएंे होती है ये यात्राऐं बुग्यालों से ही होकर जाती हैं और इनके रूकने के स्थान गुफा या उडियार होता है।
हिमालय का यह क्षेत्र प्राकृतिक सौन्दर्य मन मोह युक्त है “यहाँ के हिमयुक्त शिखरों के तलहटी पर ऊची ऊची चोटियों के मध्य कटिक्षेत्र में झाड़ियों के वस्त्र हैं इनके बीच दुर्लभ औषधियां ऊगी है इन चोटियों की धार व धास के मैदानों में दिव्य गुण वाले पादप हैं जो पृथ्वी से निकलकर औषधि अपने आस- पास के परिवेश को अलोकित कर रही है“ इन रमणीय स्थलों मं प्राकृतिक सौन्दर्य के बीच विश्व का हर प्राणी आना चाहता है। आधुनिकीकरण के इस युग में भी इस क्षेत्र के प्राकृतिक सौन्दर्य का महत्व कम नहीं हुआ है
यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सौन्दर्यता के कारण यहां विभिन्न देश विदेशों से पर्यटक पंहुचते हैं और इस क्षेत्र को धन्यवाद दिए वापस नहीं जाते है यहाँ अनेक ग्लेशियर हैं बुग्याल, गुफाएँ, उडियार, ताल एवं कुण्ड स्थित हैं। जो इस क्षेत्र के प्राकृतिक सौन्दर्य को और भी मनमोह युक्त कर देता है। किन्तु आज बुग्यालों में दिव्य युक्त जड़ी बूंटियों व घास का न उगना व उडियारों का टूटना इस क्षेत्र के प्राकृतिक सौन्दर्य को नष्ट होने की संभावना दिन प्रतिदिन बढ़ रही है आज यहां प्रत्यक्ष रूप से पिण्डारी ग्लेशियर अपने मूल स्थान से 15 किमी पीछे होना इस बात की पुष्टि करता है। हिमालय के उच्च चोटियों के मध्य बड़े घास के मैदानों के बीच सुन्दर कुण्ड है जिसकी पूजा अर्चना यहाँ के ग्वाल, अनियाल करते हैं यहां पर इन कुण्डों से अनियाल और पशु पानी पीते है और उडियारों में रहते हैं
Keywords 3274
Field Sociology > Archaeology / History
Published In Volume 6, Issue 2, March-April 2024
Published On 2024-03-20
Cite This बागेश्वर जनपद के सीमान्त हिमालय का प्राकृतिक सोन्दर्य एवं एतिहासिकता - KAMAL SINGH - IJFMR Volume 6, Issue 2, March-April 2024. DOI 10.36948/ijfmr.2024.v06i02.15338
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2024.v06i02.15338
Short DOI https://doi.org/

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