International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में बाल अपराध के प्रमुख कारक

Author(s) Mr. Bal Govind Verma, Dr. Dal Chandra
Country India
Abstract वर्तमान समय में बाल अपराध की समस्या उन प्रमुख समस्याओं में से एक है जिसे आपराधिक व्यवहार के क्षेत्र में सर्वाधिक महत्व दिया जा रहा है। यह एक ऐसी समस्या है जो मूल रूप से परिवार और समुदाय के विघटन का परिणाम है। दुनिया के लगभग सभी देशों में बाल अपराधियो की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि चिंता का विषय है क्योंकि जिन बच्चों पर देश या राष्ट्र का भविष्य निर्भर करता है अगर वे असामान्य बच्चे बन जाते हैं तो देश का भविष्य बिगड़ सकता। बाल अपराध एक सामाजिक समस्या है। इसलिए बाल अपराध के कारण भी समाज में मौजूद हैं। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार कोई भी जन्म से अपराधी नहीं होता वरन जन्म के पश्चात ही अपराधी प्रवृत्ति का हो जाता है। जो व्यक्ति प्रौढ़ावस्था में प्रवेश कर चुके होते हैं और वह सामाजिक नियमों या कानूनों के विरुद्ध कार्य करते हैं। उसे अपराध माना जाता है और यदि इस कार्य को अपरिपक्व बालक के द्वारा किया जाता है तो उसे बाल-अपराध की संज्ञा दी जाती है। भारत में सामान्य रूप में छोटे अपराध और विशेषरूप में जघन्य अपराध बच्चों द्वारा नियमित रूप से किये जा रहे हैं। चोरी, सेंधमारी, झटके से छीनने जैसे अपराध जिनकी प्रकृति बहुत गंभीर नही है या डकैती, लूटमार, हत्या और दुष्कर्म आदि जैसे अपराध जो गंभीर प्रकृति से संबंधित है पूरे देश में उत्थान पर हैं और सबसे दुर्भाग्य की बात ये है कि इस तरह के सभी अपराध 18 साल की आयु से कम के बच्चों द्वारा किये जा रहे हैं। रॉबिन्सन के अनुसार आवारागर्दी, भीख माँगना,निरूद्देश्य इधर-उधर घूमना, उदण्डता बाल अपराधी के लक्षण है। गरीबी सबसे बड़ा कारण है जो बच्चे को अपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के लिये मजबूर करती है। इसके अलावा आजकल सामाजिक मीडिया की भूमिका को किशोरों के मस्तिष्क में सकारात्मक प्रभाव के स्थान पर नकारात्मक प्रभाव अधिक डालती है।
Keywords बाल अपराध, मनोवृत्ति, नैतिकता, आवारागर्दी, समाज
Field Sociology > Administration / Law / Management
Published In Volume 7, Issue 4, July-August 2025
Published On 2025-08-30
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i04.54735

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