International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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आधुनिक भारतीय मुर्तिकला में नारी. पुरूष की युगल रूप की अभिव्यक्ति

Author(s) Manoj Kumar, Prof. Dr. Sanjeev Kumar
Country India
Abstract मिथुन या पुरूष तथा नारी का मिलनात्मक रूप संसार की कला में युग-युग से अभिव्यक्त होता आ रहा है। नारी तथा पुरूष के सम्बन्ध को व्याख्या करने में कभी चित्रकार, मूर्तिकार, दार्शनिक तथा समाज शास्त्री सभी ने रूचि दिखाई है। चाहे भारतीय हो या पश्चिमी। विद्धानों ने इस सम्बन्ध पर बहुत प्रकाश डाला है। समाजशास्त्री तथा मनोवैज्ञानिकों के दृष्टिकोण से कलाकार की व्याख्या भिन्न रही। एक समाजशास्त्री नारी-पुरूष के सम्बन्ध को इस तरह से व्याख्या करना चाहता है कि समाज की अग्रगति सही रूप से बढ़ सके एक समाज शास्त्री इस सम्बन्ध को निर्दिष्ट करने के लिये विधी नियमों का व्यवहार करता है। एक मनोवैज्ञानिक इस सम्बन्ध को अपनी प्रयोग एवं खोज के आधार पर व्याख्या करना चाहता है एवं इन व्याख्याओं में सबसे अधिक प्रमुखता नर-नारी की शारीरिक सम्पर्क पर होती है। जो भी हो नारी तथा पुरूष के सम्बन्ध का सबसे महत्वपूर्ण बन्धन प्रेम है। प्रेम की परिभाषा देते हुए विख्यात अमरिकन दार्शनिक ने कहा ‘‘प्रेम ऐसी क्रियाशीलता है जिसका उद्धेश्य एवं मूल्याकंन दूसरे के मन के उसी मूल्याकंन को आगे बढाने के लिए है। इस प्रकार की परिभाषा अमरिकन दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है जिसमें नारी-पुरूष के सम्बन्ध का पश्चिमी दृष्टिकोण प्रकट है दूसरी तरफ भारतीय दृष्टिकोण से इस सम्पर्क की व्याख्या एक सम्पूर्ण रूप में दार्शनिकता के आधार पर की जाती है। भारतीय दर्शन में इस सम्पर्क को बहुत ही आध्यात्मिक स्तर द्वारा व्याख्या किया है।
नाट्य शास्त्र में कहा गया - स च स्त्री पुरूषहेतुक उतमयुव प्रकृतिः।
कलाकार जो कुछ भी देखता है वह केवल सुन्दर को ही देखना चाहता है। इसलिये संसार के हर रूपों में जिसमें प्रकाश भी है अंधकार भी है, पर कलाकार अंधकार को छोडकर प्रकाश की ही साधना करता है जैसे एक प्रेमी अपनी पे्रमिका के अवगुण को देख नही पाते है। उस तरह से एक कलाकार भी अपने अनुभव के सुन्दर अंश को ही दर्शाना चाहता है। अतः एक प्रेमी कलाकार एवं एक कलाकार प्रेमी का कोई भेद नहीं होता है।
Field Arts
Published In Volume 7, Issue 4, July-August 2025
Published On 2025-08-30
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i04.54747

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