International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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प्राचीन भारतीय गणित में शून्य का विकास और उसका सामाजिक प्रभाव: एक संपूर्ण अध्ययन

Author(s) Mr. Nihal Kumar (Jaiswal)
Country India
Abstract शून्य की खोज मानव सभ्यता के इतिहास में एक ऐसी क्रांतिकारी उपलब्धि है जिसने न केवल गणित और विज्ञान के क्षेत्र में मौलिक परिवर्तन लाया, अपितु मानवीय चिंतन की दिशा ही बदल दी। प्राचीन भारत में इस अवधारणा का विकास एक बहुआयामी और दीर्घकालिक प्रक्रिया थी जो वैदिक दर्शन की गहन 'शून्यता' की संकल्पना से प्रारंभ होकर, उपनिषदों में इसके दार्शनिक विवेचन, पिंगल के छंदशास्त्र में द्विआधारी तर्क के प्रयोग, बख्शाली पांडुलिपि में इसके प्रथम लिखित साक्ष्य, आर्यभट्ट द्वारा दशमलव स्थान-मान प्रणाली के व्यवस्थित प्रतिपादन, और अंततः ब्रह्मगुप्त द्वारा शून्य के संपूर्ण गणितीय नियमों के संहिताकरण तक विस्तृत हुई।

यह शोधपत्र तीन मुख्य आयामों में विभाजित है: प्रथम, प्राथमिक संस्कृत स्रोतों के विश्लेषण के माध्यम से शून्य के दार्शनिक और गणितीय विकास का ऐतिहासिक अध्ययन; द्वितीय, भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था, शिक्षा और विज्ञान पर इसके व्यापक प्रभावों का मूल्यांकन; और तृतीय, इसके वैश्विक प्रसार और आधुनिक प्रौद्योगिकी पर दीर्घकालिक प्रभाव का विश्लेषण। यह अध्ययन दर्शाता है कि शून्य की खोज केवल एक तकनीकी नवाचार नहीं थी, बल्कि यह मानवीय बुद्धि की एक अमूर्त अवधारणा को मूर्त गणितीय रूप देने की सफल चेष्टा थी।
Keywords शून्य, ब्रह्मगुप्त, आर्यभट्ट, पिंगल, शून्यता, दशमलव प्रणाली, बख्शाली पांडुलिपि, खहर, द्विआधारी प्रणाली, स्थान-मान
Field Arts
Published In Volume 7, Issue 4, July-August 2025
Published On 2025-08-31
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i04.54882

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