International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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वॉश पेंटिंग का इतिहास चीन से जापान और भारत तक

Author(s) रेशमा, Prof. Dr. अमरगीत चंडोक
Country India
Abstract वॉश पेंटिंग एशिया की प्रमुख कलात्मक परंपराओं में से एक है। इसका आरंभ चीन में हुआ और फिर यह जापान के रास्ते भारत पहुँची। इसकी मुख्य विशेषता पारदर्शिता, कोमल रंग और बार-बार की जाने वाली धुलाई की प्रक्रिया है। इस तकनीक से चित्रों में गहराई और धुंधलापन आता है, जो दर्शक को एक आध्यात्मिक अनुभव कराता है। चीन में यह शैली तांग और सॉन्ग काल के दौरान विकसित हुई, जहाँ ताओवाद और ज़ेन दर्शन ने इसे गहरा वैचारिक रूप दिया। उस समय के कलाकारों ने न केवल प्रकृति का सौंदर्य जैसे पर्वत, नदियों और वृक्षों को चित्रित किया, बल्कि आत्मचिंतन और साधना कीे अभिव्यक्ति भी करी। जापान में वॉश शैली को “सुइबोकु-गा” के रूप में पहचान मिली। 14वीं 15वीं सदी में यह खूब फली-फूली। जापानी सौंदर्य दृष्टि “वाबी-साबी” और ज़ेन बौद्ध धर्म ने इसे सरलता, शांति और अपूर्णता की सुंदरता से जोडा। सेशु तोयो, योकोयामा ताइकन और हिशिदा शुनसो जैसे कलाकारों ने इसे जापानी सांस्कृतिक जीवन और आधुनिक कला की गहराई से जोड़ दिया। भारत में वॉश पद्धति 20वीं सदी की शुरुआत में आई। जापानी विचारक ओकाकुरा काकुजो और उनके शिष्यों की यात्रा ने अवनींद्रनाथ टैगोर को प्रेरित किया। उन्होंने इस शैली को भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद से मिला दिया इस प्रकार बंगाल स्कूल के माध्यम से यह एक राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बनी। अवनींद्रनाथ की भारत माता जैसी कृतियों ने इसे स्वतंत्रता संग्राम का सांस्कृतिक चेहरा बना दिया उनके शिष्यों नें जैसे नंदलाल बोस और अन्य कलाकारों ने पौराणिक कथाओं व परंपराओं को वॉश पद्धति से जीवंत किया। यह शोध पत्र वॉश पेंटिंग की तकनीक, विषय-वस्तु और सांस्कृतिक दृष्टिकोण का तुलनात्मक अध्ययन करता है। चीन में यह साधना का माध्यम बनी, जापान में शांति और सौंदर्य का प्रतीक, और भारत में राष्ट्रीय चेतना व सांस्कृतिक पुनर्जागरण की आवाज। आज भी वॉश पेंटिंग एशियाई कला संवाद का अहम हिस्सा है।
Keywords वॉश पेंटिंग, चीन, जापान, भारत, ऐतिहासिक विकास, सांस्कृतिक परंपरा, बंगाल स्कूल, तुलनात्मक अध्ययन, राष्ट्रीय चेतना।
Field Arts > Drawing
Published In Volume 7, Issue 5, September-October 2025
Published On 2025-09-13
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i05.55052

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