International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

A Widely Indexed Open Access Peer Reviewed Multidisciplinary Bi-monthly Scholarly International Journal

Call for Paper Volume 8, Issue 2 (March-April 2026) Submit your research before last 3 days of April to publish your research paper in the issue of March-April.

भारतीय ज्ञान परंपरा और विश्वबोध :- एक समीक्षात्मक दृष्टिकोण

Author(s) Mrs. Arpana Kumari
Country India
Abstract वर्तमान युग में किसी विचार की वास्तविक ज्ञान के लिए मात्र बौद्धिक शक्ति का होना पर्याप्त नहीं है। भौतिक शक्ति भी चाहिए, अर्थात भीड़ और पूंजी की शक्ति। सौ साल पहले लोग ज्ञानियों का अपार आदर करते थे और पांच सौ-हजार साल पहले वे ही समाज के आलोक स्तंभ थे। ऐसे परिवेश में भारतीय ज्ञान परंपराओं पर फिर से बहस, चर्चा -परिचर्चा ,विमर्श एवं चिंतन शुरू करने के कुछ निर्माणात्मक नतीजे हो सकते हैं। यह खासकर तब अधिक अर्थपूर्ण है, जब हम सांस्कृतिक आत्मविस्मृति के शिकार हैं। दरअसल वैश्विक घटनाओं और सूचनाओं के संसार से इतनी ज्यादा चीजें हमें घेर रही हैं कि हजारों साल की हमारी बहुत-सी मूल्यवान चीजें ढकती जा रही हैं। कहने की जरूरत है कि हम अपने अतीत के मूल्यवान ज्ञान को खोकर, चाहे वह सुदूर अतीत का हो या आधुनिक युग का, समाज में प्रेम, स्वतंत्रता और न्याय की रक्षा नहीं की जा सकती। आज मुख्य एवं प्रासंगिक बिंदु है कि, भारतीय ज्ञान की एक ही परंपरा है या कई परंपराएं हैं, वह परंपरा (ट्रेडिशन)है या पद्धति (सिस्टम) है? स्पष्ट है कि इस बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक देश में भारतीय ज्ञान की एक या दो परंपराएं नहीं हैं। उसकी कई परंपराएं हैं जो किसी भी युग में परस्पर विच्छिन्न तथा रेल के बंद डिब्बे की तरह नहीं रही हैं।
इसी तरह ‘पद्धति’ कहने से किसी सुनिश्चित युक्ति या व्यवस्था का बोध होता है, जबकि परंपरा कहने से अपने को निरंतर नई करती रहने वाली किसी सांस्कृतिक धारा का। इधर शिक्षा जगत में भारतीय ज्ञान परंपराओं की जगह पद्धतियों पर जोर देते हुए कहा जा रहा है, ‘हमें अपनी प्राचीन विरासत से भारतीय ज्ञान पद्धतियों को पुनर्उपलब्ध करना है और दुनिया को बताना है कि हमारे काम करने की एक भारतीय पद्धति है।’ सवाल है, क्या ‘भारत का ज्ञान’ सिर्फ प्राचीन ज्ञान पद्धतियों को जानने भर से हो जाएगा या आधुनिक युग तक के विकासों और नवोन्मेषों को समझने की जरूरत है?
भारतीय ज्ञान परंपराओं का अध्ययन पिछले ढाई सौ साल से हो रहा है। ओरियंटलिस्ट (प्राच्यविद) हमें बता रहे थे कि हम क्या थे, हमेशा कितने पिछड़े और विभाजित थे और यूरोपियन वस्तुतः ‘सभ्यता के मिशन’ पर हैं, जो ‘ह्वाइटमेंस बर्डन’ है। आज ऐसे ज्ञान का ‘डिकोलोनाइजेशन’ जरूरी है। अब एक बार फिर जोर-शोर से भारतीय ज्ञान पद्धतियों की ओर ध्यान आकर्षित किया जा रहा है और इनमें वायुयान, प्लास्टिक सर्जरी, ब्रह्मास्त्र के रूप में मिसाइलों आदि के दृष्टांत खोजे जा रहे हैं। उन्हें शाश्वत माना जा रहा है। इसका ‘डिमिस्टिफिकेशन’ जरूरी है।
Keywords बीज शब्द- ज्ञान परंपरा, ज्ञान मीमांसा, आचार मीमांसा, तत्व मीमांसा, षड दर्शन, अहिंसा, सत्य, अस्तेय एवं ब्रम्हचर्य
Field Sociology > Philosophy / Psychology / Religion
Published In Volume 7, Issue 5, September-October 2025
Published On 2025-09-08
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i05.55519

Share this