International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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चुरू ज़िले में मरुस्थलीकरण की समस्या और उसके निवारण के उपाय

Author(s) NITIN KUMAR
Country India
Abstract मरुस्थलीकरण आज विश्वस्तर पर एक गंभीर पर्यावरणीय संकट के रूप में उभर कर सामने आया है। संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण नियंत्रण संधि (UNCCD, 1994) के अनुसार, मरुस्थलीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण शुष्क, अर्ध-शुष्क एवं शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्रों की भूमि की उत्पादकता निरंतर घटती जाती है। अनुमानतः विश्व के लगभग 40 प्रतिशत भूभाग पर मरुस्थलीकरण का खतरा विद्यमान है, जिससे सीधे तौर पर लगभग 2 अरब लोग प्रभावित हो रहे हैं (United Nations, 2019)। भारत जैसे विकासशील देशों में यह समस्या और भी गंभीर है क्योंकि यहाँ की बड़ी आबादी कृषि और पशुपालन पर निर्भर है। भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा किसी न किसी रूप में मरुस्थलीकरण से प्रभावित है (ISRO, 2016)। विशेष रूप से राजस्थान राज्य में, जो कि देश का सर्वाधिक शुष्क राज्य है, मरुस्थलीकरण की समस्या गहन रूप से अनुभव की जाती है। राजस्थान के कुल क्षेत्रफल का लगभग 61.8 प्रतिशत भाग मरुस्थलीकरण से प्रभावित है (CAZRI, 2010)। इसी संदर्भ में चुरू ज़िला एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र के रूप में उभरता है, क्योंकि यह थार मरुस्थल के उत्तर-पूर्वी छोर पर स्थित है और यहाँ की भौगोलिक, जलवायु एवं सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियाँ मरुस्थलीकरण की समस्या को और तीव्र बना देती हैं। चुरू ज़िले में औसत वार्षिक वर्षा मात्र 300–350 मिमी के आसपास है, जो असमान एवं अनियमित रूप से वितरित होती है, साथ ही यहाँ पर गर्मियों में तापमान 48–50 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है (Rajasthan Climate Report, 2020)। इन प्राकृतिक परिस्थितियों के साथ-साथ वनों की कमी, अति-चराई और भूमिगत जल के अत्यधिक दोहन जैसी मानवीय गतिविधियाँ इस क्षेत्र को मरुस्थलीकरण के लिए अत्यधिक संवेदनशील बना देती हैं। अतः चुरू ज़िले में मरुस्थलीकरण की समस्या एवं इसके निवारण उपायों का अध्ययन करना न केवल स्थानीय स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय व वैश्विक स्तर पर भी अत्यंत प्रासंगिक है।
Published In Volume 7, Issue 5, September-October 2025
Published On 2025-09-13
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i05.55886

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