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E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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21वीं सदी के उपन्यासों में व्याप्त आदिवासी जीवन के संघर्ष का चित्रण (ग्लोबल गांव के देवता, पठार पर कोहरा, जंगल जहां शुरू होता है, अल्मा कबूतरी) उपन्यासों के विशेष सन्दर्भ में

Author(s) पूनम
Country India
Abstract सारांश:
भारत एक धर्मनिर्पेक्ष देश है, जहां अनेक भाषाऐं, धर्म, संस्कृतियां एवं परम्पराऐं है। भारत की सन् 2011 जनगणना के अनुसार आदिवासियों की संख्या लगभग 8‐6 प्रतिशत है, तथा भारतीय संविधान में इन्हे अनुसूचित जाति के नाम से संबोधित किया गया है। आदिवासी शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है, ‘आदि‘ जिसका अर्थ है आदिकाल से तथा ‘वास‘ जिसका अर्थ है, रहने वाले। “जनजातियों की जड़ें इस देश में बहुत गहरी और पुरानी हैं। वे इस भू-भाग के सर्वप्रथम भी हों न हों, वे निश्चित रूप से यहाँ के पुरातन निवासियों में हैं, वे वनों और पर्वतों के अपेक्षाकृत एकांत में रहते हैं। उनका परिवेश अगम्य भले ही रहा हो, किन्तु उसकी दूरी नें सांस्कृतिक प्रभावों पर स्वाभाविक नियंत्रण रखा है“1 अतः देश के वे मूलनिवासी जो प्राचीनतम समय से देश के निवासी है। आदिवासी प्राचीन समय से ही जंगलो में रहते आए हैं। उनका पूरा जीवन जंगलो पर ही निर्भर करता है। परन्तु बाहरी शिक्षित वर्ग जो अपने आप को सभ्य कहता है, उनके जंगलों का हड़प रहे हैं। आदिवासी समाज बाहरी सभ्य समाज से ज्यादा सम्पर्क बनाए बिना अपने अस्तित्व को बचाऐ हुए हैं। आदिवासी समुदाय में संघर्षों की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इनके जल, जंगल, जमीन पर जब-जब दूसरे समुदायों नें आक्रमण किया तब-तब इन्होंने अपने प्राणों पर खेलकर विद्रोह व आंदोलन किए। आदिवासी समुदाय की वेदना इतनी गहरी है कि सुनकर हमारी आत्मा कांप उठेगी। आदिवासी सदैव शोषित होता रहा है और अपने अधिकारों के लिए लड़ता रहा है, उसकी स्थिति आज भी दयनीय है। 21वीं सदी के उपन्यासों में आदिवासियों के शोषण एवं संघर्ष को, उनकी अस्मिता के संकट को तथा उनके संघर्ष की आवाज़ को बखूबी उजागर किया जा रहा है। आधुनिक युग के उपन्यासों में आदिवासियों के जीवन को केंद्र में रखकर उनके जीवन में व्याप्त परंपरा, सभ्यता तथा उनके साथ हो रहे अन्याय, अत्याचार, शोषण तथा शिक्षित वर्ग जो अपने आपको सभ्य शहरी जीवन के लोग मानते हैं उनके द्वारा आदिवासियों को नकारात्मक दृष्टि से देखा जाना आदि को सविस्तार बखूबी दर्शाया गया है। उदाहरण के लिए संजीव का उपन्यास ‘जंगल जहां से शुरू होता है‘(सन् 2000 ई.) तथा ‘पांव तले की दूब‘ मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास ‘अल्मा कबूतरी‘ तथा रणेन्द्र का उपन्यास ‘ग्लोबल गांव के देवता‘ आदि बहुत से उपन्यासों में जनजातियों के जल, जंगल, जमीन के लिए संघर्ष को सहज और सरल रूप में पाठकों के सामने प्रकट किया गया है।
Keywords आदिवासी चित्रण, संघर्ष, वेदना, शोषण, परंपरा, सांस्कृतिक, विद्रोह व आंदोलन, उपन्यासकार I
Field Arts
Published In Volume 7, Issue 5, September-October 2025
Published On 2025-09-28
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i05.56300

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