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E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में प्रसाद का सिद्धान्त और नौकरशाही के मध्य द्वंद्वात्मक संबंध

Author(s) Mr. Shashi Shekhar Singh Chauhan, Dr. Mohammad Juned Ansari
Country India
Abstract भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था लोकतांत्रिक शासन-प्रणाली की रीढ़ मानी जाती है। प्रशासनिक ढाँचा जहाँ नीतियों के क्रियान्वयन एवं जनता तक शासन की पहुँच सुनिश्चित करता है, वहीं यह राजनीतिक सत्ता और संवैधानिक मूल्यों के मध्य सेतु का कार्य भी करता है। इस संदर्भ में प्रसाद का सिद्धान्त ;क्वबजतपदम व िच्समंेनतमद्ध तथा नौकरशाही के बीच संबंध विशेष महत्व रखते हैं।
प्रसाद का सिद्धान्त भारतीय संविधान के अनुच्छेद 310 और 311 में निहित है, जिसके अंतर्गत यह व्यवस्था की गई है कि लोक सेवक राज्य के ‘प्रसाद’ पर अपने पद पर आसीन रहते हैं। अर्थात् उनका कार्यकाल निश्चित न होकर राज्य के विवेकाधिकार पर निर्भर करता है। दूसरी ओर, नौकरशाही शासन की स्थायी और तटस्थ संस्था है, जो न केवल प्रशासनिक निरंतरता प्रदान करती है बल्कि नीति-निर्माण और उसके क्रियान्वयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यहीं पर द्वंद्व उत्पन्न होता हैकृएक ओर लोक सेवकों की स्थायित्व एवं तटस्थता की आवश्यकता है, तो दूसरी ओर संवैधानिक व्यवस्था उन्हें शासक वर्ग के प्रसाद पर आश्रित बताती है। परिणामस्वरूप, भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में सत्ता, राजनीति और प्रशासनिक स्वायत्तता के मध्य निरंतर खींचतान बनी रहती है। यही द्वंद्व इस विषय को गहन अध्ययन और विश्लेषण योग्य बनाता है।
Published In Volume 7, Issue 5, September-October 2025
Published On 2025-10-02
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i05.57084

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