International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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भारत में मोटे अनाज की समस्याएँ एवं संभावनाएँ: एक भौगोलिक विश्लेषण

Author(s) Kajal Bharti
Country India
Abstract भारत में मोटे अनाज (मिलेट्स) जैसे बाजरा, रागी, कोदो, कुटकी, सांवा एवं ज्वार पारंपरिक कृषि प्रणाली, ग्रामीण आजीविका और पोषण का महत्वपूर्ण आधार रहे हैं। शुष्क व अर्ध-शुष्क क्षेत्रों, विशेषकर राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड तथा बिहार के पठारी भागों में इनका उत्पादन भौगोलिक दृष्टि से अनुकूल पाया जाता है। किंतु हरित क्रांति के बाद सिंचित कृषि, धान-गेहूँ केंद्रित नीतियाँ, बाजार-प्रोत्साहन की कमी, बदलते उपभोक्ता व्यवहार एवं सामाजिक दृष्टिकोण के कारण इनके उत्पादन, क्षेत्र तथा उपभोग में निरंतर कमी आई है। यह अध्ययन भारत में मोटे अनाज के स्थानिक वितरण, उत्पादकता पैटर्न, भौगोलिक चुनौतियों एवं भावी संभावनाओं का विश्लेषण करता है। इसके लिए DES, IMD, ICAR-IIMR, FAO, NFHS, एवं कृषि जनगणना के आँकड़ों के साथ सांख्यिकीय तकनीकों का उपयोग किया गया। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि मोटे अनाज मुख्यतः कम वर्षा (300–600 मिमी), लाल-बालुई या काली कपास मिट्टी तथा कम उर्वरक निवेश वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाए जाते हैं। इनसे जुड़ी प्रमुख समस्याएँ हैं—भूमि उपयोग परिवर्तन, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व सरकारी खरीद की कमी, प्रसंस्करण एवं विपणन अवसंरचना का अभाव, आधुनिक तकनीक व जागरूकता की कमी, तथा “गरीब का भोजन” जैसी सामाजिक धारणाएँ। फिर भी, मोटे अनाज में अपार संभावनाएँ निहित हैं—ये कम जल उपयोग, उच्च पोषण (फाइबर, आयरन, कैल्शियम), जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन, कार्बन उत्सर्जन में कमी, तथा पोषण-सुरक्षा व निर्यातोन्मुख कृषि के लिए अत्यंत उपयुक्त हैं। अतः यदि इनका वैज्ञानिक संवर्धन, मूल्य-वर्धन, MSP एवं PDS में समावेशन तथा स्थानीय भूगोल के अनुरूप नीति-निर्माण किया जाए, तो यह टिकाऊ कृषि एवं भू-आर्थिक विकास का सशक्त माध्यम बन सकते हैं।
Keywords मोटे अनाज, पारंपरिक कृषि प्रणाली , हरित क्रांति, भूमि उपयोग, उच्च पोषण
Published In Volume 7, Issue 5, September-October 2025
Published On 2025-10-24
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i05.58786

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