International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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उड़ान भरती शकुंतिकाएं

Author(s) Dr. Jaysing Maruti Kamble
Country India
Abstract घर-परिवार की जिम्मेदारियों को सँभलते हुए, घर की दहलीज को लांघकर स्त्री शिक्षा, स्वास्थ्य, खेल, साहित्य, विज्ञान, तकनीकी, अंतरिक्ष, कृषि, राजनीति ऐसे जीवन के हर क्षेत्र में अपना नाम रोशन कर रही है। हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार भगवानदास मोरवाल ने अपने शकुंतिका उपन्यास की कथावस्तु वर्तमान बदलती स्त्री को केंद्र में रखकर बुनी है। शकुंतिका का मतलब है नन्हीं चिड़िया। भारतीय समाज जहां आज भी लड़कों की किलकारियां सुनने को तरसता है। वहाँ लेखक बेटियों के जन्म पर खुशी मनाने का संदेश देते हैं। लेखक ने समाज की बदलती सोच को दिखाते हुए, बेटा और बेटी के कम होने वाले फर्क को स्पष्ट किया है। उपन्यास में दुर्गा और भगवती का परिवार चित्रित किया है। ये दोनों नायिकाएं इतनी आधुनिक हैं कि किसी लड़के को गोद लेने के बजाए पीहू नामक नन्हीं बच्ची को गोद लेने का फैसला लेती हैं। यह बात लड़कियों की ओर देखने का नजरिया स्पष्ट करती है। इससे लेखक लड़कियों की सक्षमता पर मुहर लगाते हैं। उपन्यास की सभी नायिकाएं शिक्षा के महत्व को बखूबी जाननेवाली है। सिया लॉ की पढ़ाई करके वकील बन जाती है। गार्गी एम.बी.बी.एस. करके सफल डॉक्टर बन जाती है। पीहू पढ़ाई के लिए विदेश में पढ़ने की छात्रवृत्ति पाकर ऑस्ट्रेलिया जाती है। इस तरह वर्तमान स्त्री उच्च शिक्षित होकर आत्मनिर्भर बन गई है। स्वयं के जीवन के फैसले खुद ले रही है। इसप्रकार लेखक अबला नारी के सबला होने का दस्तावेज पेश करते हैं। स्त्री अगर सबला हो जाए तो स्वस्थ समाज और राष्ट्र की निर्मिती सहज सफल बन सकती है, इस ओर इशारा करते हैं।
Keywords शकुंतिका, सबलीकरण, आत्मनिर्भर, निर्णयशील।
Published In Volume 7, Issue 5, September-October 2025
Published On 2025-10-31
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i05.59453

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