International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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1871 का आपराधिक जनजाति अधिनियम: सामाजिक कलंक और सामुदायिक हाशिए पर प्रभाव का विश्लेषण

Author(s) Mr. Vasu Dev Meena
Country India
Abstract यह शोध पत्र ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा 1871 में लागू किए गए आपराधिक जनजाति अधिनियम के दीर्घकालिक सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और संस्थागत प्रभावों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है। यह अधिनियम जो लगभग 150 से अधिक जनजातियों को जन्मजात अपराधी घोषित करता था, ने भारतीय समाज में एक ऐसा सामाजिक कलंक उत्पन्न किया जो आजादी के सात दशक बाद भी विद्यमान है। इस अध्ययन में 1871 से 1952 तक के कानूनी प्रावधानों, उनके सामाजिक परिणामों, और स्वतंत्रता के बाद इन समुदायों की स्थिति का समालोचनात्मक विवेचन किया गया है। शोध में रेनके आयोग और अयंगर समिति की सिफारिशों का भी विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है जो इन जनजातियों के पुनर्वास और मुख्यधारा में समावेशन के लिए आवश्यक हैं। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि औपनिवेशिक कानून केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि समकालीन भारत में भी सामाजिक भेदभाव और संरचनात्मक हिंसा का स्रोत बना हुआ है।
Keywords आपराधिक जनजाति अधिनियम, विमुक्त जनजातियाँ, घुमंतू जनजातियाँ, सामाजिक कलंक, ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति, जन्मजात अपराधी सिद्धांत, सामाजिक बहिष्कार, रेनके आयोग, जातीय भेदभाव, मानवाधिकार उल्लंघन
Field Sociology > Archaeology / History
Published In Volume 7, Issue 6, November-December 2025
Published On 2025-11-12
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i06.60224

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