International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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“योगाभ्यास के द्वारा अन्नमयकोश को संतुलित एवं विकसित करना”

Author(s) मनीष राणा
Country India
Abstract “योगाभ्यास के द्वारा अन्नमयकोश को संतुलित एवं विकसित करना” विषयक इस शोध में भारतीय योगदर्शन के पंचकोशीय सिद्धांत के प्रथम आवरण, अन्नमयकोश, का विश्लेषण किया गया है। अन्न से निर्मित स्थूल शरीर को अन्नमयकोश कहा जाता है तथा इसकी शुद्धि, पोषण और संतुलन पूर्णतः आहार, जीवनशैली और शारीरिक क्रियाओं पर निर्भर है। आधुनिक युग में असंतुलित दिनचर्या, दुषित आहार एवं तनाव के कारण अन्नमयको में विकृतियाँ बढ़ रही हैं।
योगाभ्यास—जिसमें आसन, प्राणायाम, यम-नियम, ध्यान एवं योगनिद्रा सम्मिलित हैं—अन्नमयकोश के संतुलन एवं विकास के प्रभावी साधन हैं। आसनों से शरीर की मांसपेशियाँ एवं तंत्र सुदृढ़ होते हैं; प्राणायाम से ऊर्जा प्रवाह और रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है; ध्यान एवं विश्रांति-प्रक्रियाएँ तनाव को कम कर शरीर की कार्यक्षमता को पुनर्स्थापित करती हैं। साथ ही, सात्त्विक एवं मिताहारी आहार अन्नमयकोश को शुद्ध, हल्का और ऊर्जावान बनाए रखते हैं।
आधुनिक चिकित्सा एवं वैज्ञानिक अनुसंधान भी यह सिद्ध करते हैं कि योग जीवनशैली-जनित विकारों—जैसे मोटापा, मधुमेह, पाचन-विकार, तनाव एवं उच्च रक्तचाप—को नियंत्रित करने में अत्यंत प्रभावी है। अतः योगाभ्यास अन्नमयकोश के स्वास्थ्य, स्थिरता और दीर्घकालिक विकास के लिए एक समग्र, वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पद्धति के रूप में स्थापित होता है।
Keywords अन्नमयकोश, पंचकोशीय सिद्धांत, योगाभ्यास, सात्त्विक आहार, संतुलित जीवनशैली।
Published In Volume 7, Issue 6, November-December 2025
Published On 2025-12-02
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i06.62092

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