International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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भक्ति भावना की परम्परा में - भक्ति काव्य

Author(s) डाॅ. मिथलेश सिंह राजपूत
Country India
Abstract साहित्य में भक्ति का सन्निवेश अपने सनातन रूप में ही सम्भव है। भक्ति कोई विचारधारा नहीं है जो बदले। भक्ति मानवीय भावों की उदात्त अभिव्यक्ति है जिसमें प्रेम तो है पर स्वाथ्र्य नहीं, शरीर है पर भोग्य नहीं, आनन्द तो है पर सुख नहीं। वह सब कुछ है जो मनुष्य चाहता है पर पाने के लिए नहीं देने के लिए। ईशावास्योपनिषद का यही ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’’ है। भारतीय संस्कृति को सनानत संस्कृति और धर्म को सनातन धर्म कहा जाता है। सनातन का अर्थ है निरन्तरता। निरन्तरता विचारों की। सनातनता नूतन का विरोध नहीं है। नवीन के अनुकूल ढल जाना, एकरस हो जाना समानता का स्वभाव है। भारतीय सनातन संस्कृति की मुख्य विशेषता है विश्वात्मवाद और त्याग। प्राचीनतम उपनिषद ईशावास्योपनिषद का मूल मंत्र किसी के धन का लोभन करके त्यागपूर्वक भोग करना चाहिए क्योंकि इस संसार में जो भी है. ईश्वरमय है। आस्था की इसी बुनियाद पर भारतीय संस्कृति का विकास हुआ है। वैदिक ऋषियों के इस जीवन दर्शन का व्यावहारिक रूप जिन महापुरुषों के जीवन में साकार हुआ है, वे हैं राम और कृष्ण। राम को जहाँ धर्म का विग्रह (रामोविग्रहवान् धर्मः) कहा गया, वहीं कृष्ण को भगवान का पूर्वावतार (कृष्णास्तु भगवान् स्वयं)माना गया। इस प्रकार सनातन संस्कृतिपुरुष राम और कृष्ण हैं जिन्हें महामानव से अद्वैत ब्रह्म के रूप तक संकलित किया गया। अरूप, अनाम और द्वय की सगुण, साकार से एकता तक की यात्रा सनातन संस्कृति का विकास काल है। वेदों ने ब्रह्म, आत्मा और विश्वात्मा तक चिन्तन की सूक्ष्म यात्रा की और ज्ञान, कर्म, उपासना को ब्रह्मज्ञ होने का साधन माना। कर्मकाण्ड की प्रमुखता होने पर सनातन संस्कारों ने पुनः परिवर्तन किया और रामायण और महाभारत के माध्यम से राम और कृष्ण के चरित का गायन हुआ। कर्मकाण्ड और स्वर्ग की कामना में रत मनुष्यों को अपने आचरण से लोकधर्म की शिक्षा देने के लिए ईश्वर का प्राकट्य समाज की आवश्यकता थी। वेदों में वर्णित सूक्ष्म, सर्वव्यापी ब्रह्म अब पृथ्वी पर था। ज्ञान और उपासना तो अज्ञात के लिए थे प्रकट ब्रह्म तो सेवा से सन्तुष्ट है। अवतारवाद से ब्रह्मा जनसुलभ हुआ तो प्राप्ति कामार्ग भी बदला। प्रेम और सेवा दो नए सोपान बने। अवतारवाद और भक्ति का गूढ़ सम्बन्ध है। चारों पुरुषार्थों से भी श्रेष्ठ भक्ति हो गयी। ज्ञान और वैराग्य भक्ति के पुत्र हो गए। यदि ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं तो भक्ति के बिना ज्ञान नहीं। भक्ति की महिमा है कि दर्शन शुष्क न रहकर सरस हो गया और साहित्य में भक्ति समाहित हो गयी।
Keywords कर्मकाण्ड, उपासना, पुरुषार्थों, संस्कृति, भक्ति, मानवीय
Published In Volume 7, Issue 6, November-December 2025
Published On 2025-12-14
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i06.63277

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