International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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तुलसीदास के काव्य में सामाजिक समरसता के संदर्भ में नारी की भूमिका

Author(s) Mr. Kamal Dev
Country India
Abstract गोस्वामी तुलसीदास जी का आविर्भाव ऐसे समय में हुआ जब भारतीय समाज अपनी परिभाषा से आत्म विस्मृत हो रहा था अर्थात अपने सामाजिक तत्वों व मूल्यों को खोता जा रहा था | उस समय गोस्वामी जी ने एक प्रकाश के समान उस सामाजिक अंधेरे को समाप्त करने का दृढ़ संकल्प किया क्योंकि संवेदनशील रचनाकार पर युग व देशकाल का प्रभाव अनिवार्य रूप से पडता है। रचनाकार जिस परिवेश में रहता है, उसी से संस्कार और प्रेरणा ग्रहण करता है। गोस्वामी जी ने भी अपने साहित्य में युगीन संस्कार लिए, जिस कारण वह उच्चकोटी के समरसतावादी कवि बने क्योंकि साहित्य ही समाज का दर्पण होता है। साहित्य ही मनुष्य को संकीर्णता से ऊपर उठाता है। मानवीय मूल्यों पर बल देना, ऊँच-नीच व रंगभेद और देशकाल की सीमाएँ उसे नहीं बाँधती। यही भावना समरसता के भाव को जागृत करती है जोकि गोस्वामी के सम्पूर्ण साहित्य में झलकती है। उन्होंने ‘रामचरितमानस’ में न केवल सामाजिक समरसता स्थापित करने की पहल की बल्कि धर्म, राजनीति, साहित्य इत्यादि क्षेत्रों में भी समरसता स्थापित करने की भी पहल की है। तुलसी जी ने जीवन और जगत के सभी क्षेत्रों में समरसता स्थापित करने का अतुलनीय प्रयास किया है। जिस कारण तुलसी जी के साहित्य में सामाजिक समरसता एवं समन्वयता दिखाई पडती है। इन्होंने दवैत - अद्‌वैत, सगुण - निर्गुण, शैव- वैष्णव, शाक्त, गरीब- अमीर, ऊँच-नीच और जातिवाद के संकीर्ण विचारों से ऊपर उठकर इन सब में समरसता व समन्वय स्थापित किया है और एक आदर्श समाज की नींव रखने का प्रयास किया है। इस आदर्श समाज के लिए नारी की भूमिका अतुलनीय एवम् आदर्शवादी रही है | इसलिए तुलसी एक उच्चकोटी के कवि, महान लोकनायक, सफल समाज सुधारक तथा भारतीय संस्कृति के श्रेष्ठ प्रचारक रहे है।
Keywords तुलसीदास, समरसता, रंगभेद, जातिवाद, समाज
Field Sociology
Published In Volume 7, Issue 6, November-December 2025
Published On 2025-12-28
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i06.64712

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