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E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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राजस्थान में तीर्थराज की अवधारणा (मचकुण्ड का विशेष अध्ययन)

Author(s) Mr. बहादुर सिंह, Dr. राजश्री सेठी
Country India
Abstract भारतीय सांस्कृतिक परम्परा में तीर्थ केवल धार्मिक स्थल न होकर सामाजिक, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक चेतना का केन्द्र रहे हैं। इन्हीं में से कुछ तीर्थ अपनी पौराणिक प्राचीनता, ग्रन्थीय मान्यता तथा लोकआस्था व निरंतर अनुष्ठानिक परंपरा के कारण 'तीर्थराज' की संज्ञा प्राप्त करते हैं। राजस्थान में तीर्थराज की अवधारणा विशेष महत्व रखती है, जहाँ का इतिहास वीरता और बलिदानों से भरा पड़ा है और यहाँ जलस्रोतों, सरोवरों और गुफा स्थलों ने धार्मिक जीवन को संरक्षित व पोषित किया। यह शोध राजस्थान में तीर्थराज की अवधारणा का अध्ययन करते हुए धौलपुर स्थित 'मचकुण्ड' को विशेष संदर्भ के रूप में प्रस्तुत करता है। मचकुण्ड का उल्लेख श्रीमदभागवतपुराण, विष्णुपुराण एवं अन्य पौराणिक ग्रन्थों में सूर्यवंशी राजा 'मचकुण्ड' से संबंधित कथा के माध्यम से प्राप्त होता है, जो इस स्थल को त्रेतायुगीन परंपरा से जोड़ता है। कालियवन-वध तथा श्रीकृष्ण की उपस्थिति मचकुण्ड को वैष्णव परम्परा में प्रमुख स्थान प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त मचकुण्ड में स्थित सरोवर, गुफाएँ व तपोस्थली इसे केवल पौराणिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक ऐतिहासिक तीर्थ के रूप में विशिष्टता प्रदान करते हैं। यह शोध यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि राजस्थान में तीर्थराज की अवधारणा केवल ग्रन्थीय मान्यता पर आधारित नहीं है, बल्कि उसमें लोकविश्वास, मेले, सामूहिक स्नान परंपरा, सामाजिक समरसता व निरंतरता जैसे तत्व भी दिखाई देते हैं। इसी तीर्थराज की अवधारणा के तहत् धौलपुर स्थित मचकुण्ड को विशेष संदर्भ के रूप में इस शोध में प्रस्तुत किया गया है।
Keywords तीर्थराज, लोक आस्था, पौराणिक प्राचीनता, वैष्णव परंपरा, सामाजिक समरसता, राजा मुचुकुंद।
Field Sociology > Archaeology / History
Published In Volume 7, Issue 6, November-December 2025
Published On 2025-12-27
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i06.64754

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