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E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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कबीरवाणी में सामाजिक न्याय: संत कबीर की कविता में समाज की विसंगतियों का चित्रण

Author(s) चेरुकूरि हरिबाबु
Country India
Abstract "कबीरवाणी में सामाजिक न्याय: संत कबीर की कविता में समाज की विसंगतियों का चित्रण" इस लेख का उद्देश्य संत कबीर की कविता में सामाजिक न्याय के तत्वों और उनके द्वारा समाज की विसंगतियों के चित्रण पर चर्चा करना है। संत कबीर का काव्य समाज में व्याप्त असमानताओं, जातिवाद, धार्मिक पाखंड और आर्थिक विषमताओं की आलोचना करता है। कबीर ने अपनी कविता में समाज के सभी वर्गों को समानता, भाईचारे और धार्मिक सहिष्णुता का संदेश दिया। उन्होंने जातिवाद और धार्मिक असमानताओं को कठोर शब्दों में नकारा और समाज में एकता की आवश्यकता को रेखांकित किया। कबीर के काव्य में धार्मिक पाखंड पर भी तीव्र आलोचना की गई, जो उस समय के धार्मिक संस्थानों द्वारा समाज को भ्रमित करने के लिए किया जा रहा था।
उनकी कविता में गरीबों और शोषितों के लिए एक विशेष स्थान है, जिनके अधिकारों की आवाज उठाने का कार्य उन्होंने किया। कबीर की कविता आज भी समाज में समानता और धार्मिकता की बात करती है, और उनके विचार समकालीन समाज के लिए प्रासंगिक हैं। उनके विचारों का प्रभाव आज के सामाजिक आंदोलनों में देखा जा सकता है, जहां समानता और न्याय की बात की जाती है। संत कबीर ने अपनी कविता के माध्यम से यह संदेश दिया कि समाज में हर व्यक्ति को समान अधिकार मिलने चाहिए और किसी भी प्रकार की सामाजिक असमानता का विरोध किया जाना चाहिए।
Keywords सामाजिक न्याय, कबीरवाणी, जातिवाद, धार्मिक पाखंड, समानता
Published In Volume 7, Issue 6, November-December 2025
Published On 2025-12-31
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i06.65474

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