International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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स्वतंत्रता संग्रामकालीन दृश्य कला में रस सिद्धांत की भूमिका का भावात्मक संप्रेषण

Author(s) Ms. SWATI
Country India
Abstract भरतमुनि के नाट्यशास्त्र नामक ग्रंथ में प्रतिपादित रस सिद्धांत जो कला और भावनात्मक प्रतिक्रिया के बीच के संबंध को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रदान करते है। रस सिद्धांत के अनुसार कला, विशेष रूप से नृत्य, संगीत, नाटक और दृश्य कला के माध्यम से, दर्शकों में विशिष्ट भावनाएँ उत्पन्न कर सकती है जैसे प्रेम, वीरता, करुणा और भय, जो व्यक्ति को व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक संदर्भों से जोड़ती हैं। यह शोध पत्र भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान दृश्य कला के माध्यम से सांस्कृतिक चेतना के जागरण और भाव जागरण में रस सिद्धांत की भूमिका को स्पष्ट करता है। यह अध्ययन यह भी विश्लेषण करता है कि किस प्रकार कलाकारों ने अपनी कला के माध्यम से समुदायों को जोड़ने, उन्हें जागरूक करने और एक साझा राष्ट्रीय पहचान बनाने में मदद की।
इस शोध का उद्देश्य यह समझना है कि कैसे रस सिद्धांत का उपयोग दृश्य कला में संघर्ष, पीड़ा, और वीरता को प्रदर्शित करने के लिए किया गया, और इससे जनमानस में देशभक्ति और एकजुटता का भाव जागृत हुआ। साथ ही, यह विश्लेषण किया जाएगा कि किस प्रकार कलाकार अपने कार्यों के माध्यम से समाज में चेतना का प्रसार करते थे, और उनके द्वारा चुने गए विषयों ने किस तरह से कला को एक राजनीतिक और सांस्कृतिक यंत्र के रूप में प्रस्तुत किया।
Keywords नाट्यशास्त्र, राष्ट्रीय आंदोलन, रस सिद्धांत, भरतमुनि, दृश्य कला, स्वतंत्रता संग्राम
Field Arts > Drawing
Published In Volume 8, Issue 1, January-February 2026
Published On 2026-01-13
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i01.66129

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