International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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' जंगली सुअर ' उपन्यास में चित्रित सामंती सोच

Author(s) पंकज कुमार
Country India
Abstract सामंती सोच सामंतवाद की मजबूत व्यवस्था को उचित आधार प्रदान करता है। हालांकि सामंतवादी व्यवस्था मुख्य रूप से यूरोपीय देशों की उपज है, किन्तु इसकी जड़ें और शाखाएँ विश्व के अधिकांश लोकतांत्रिक देशें में फैल चुकी हैं। भारतीय ग्रामीण समाज भी इससे अछूता नहीं है। साहित्यकार मधुकर सिंह ने अपने उपन्यास ‘जंगली सुअर’ में सामंती सोच के सामाजिक व आर्थिक पहलू को उजागर करने की कोशिश की है। इस उपन्यास में दीन-हीन, दलित, असहाय एवं ग्रामीण समाज के हाशिए पर रह रहे सनीचर, रधुनी और गनेसी जैसे लोगों पर हो रहे सामंती अत्याचार को चित्रित किया गया है। उपन्यासकार ने सामंती सोच की मानसिकता से संलिप्त और इससे ताल्लुक रखने वाले रामनाथ भाई और सुकुल जैसे लोगों को जानवरों के समक्ष रखते हुए इसे जंगली सुअर की उपमा दी है। सामंतवाद का यूरोपीय स्वरूप स्पष्ट रूप से वर्तमान भारतीय ग्रामीण समाज में कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं है, किन्तु सामंती प्रवृत्ति और सोच अपने निकृष्टतम रूप में हमारे सामने आज भी सुरसा जैसी राक्षसी के रूप में विकरालतम रूप लिए हुए है। जमीन हड़पने, गरीबों को जानबूझकर सूद पर पैसे लेने को मजबूर करने, सूद में दो के बदले चार लेने तथा औरतों को भोग की वस्तु समझने वाली व्यवस्था आज भी भारतीय समाज की दैनिक गतिविधियों का एक अभिन्न अंग है। इस कार्य को करने वाले लोग वास्तव में सामंत तो नहीं है, लेकिन उनकी मानसिक प्रवृत्ति उन्हें सामंती सोच के समकक्ष रखती है। ‘जंगली सुअर’ उपन्यास की विभिन्न घटनाएँ इसी सामंती सोच को उजागर करती है।
Keywords सामंती प्रवृत्ति, सामंतवाद, सामाजिक एवं आर्थिक पहलू, विलासितापूर्ण जीवन, रूढ़िवादिता, दृष्टिगोचर, निकृष्टतम रूप, भूमि केंद्रित इत्यादि।
Field Arts
Published In Volume 8, Issue 1, January-February 2026
Published On 2026-01-25
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i01.67260

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