International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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महाकाव्य का स्वरूप निर्धारित करने वाले आवश्यक तत्व

Author(s) Dr. दीपा जोशी
Country India
Abstract प्रतिपाद्य विषय ‘महाकाव्य का स्वरूप’ पर विस्तृत विवेचन से पूर्व ‘साहित्य’ शब्द की व्युत्पत्ति के विषय में जानते हंै। साहित्य की सर्वमान्य रूप से व्युत्पत्ति है- ‘सहितस्य भावः साहित्यम्’ यहाँ पर ‘गुणवचन ब्राह्मणादिभ्यः कर्माणि च’ से ष्य´् प्रत्यय होकर ‘साहित्य’ शब्द बना है। ‘साहित्यस्य कर्म साहित्यम्’ के अनुसार कवि कर्म रूप साहित्य के अन्दर सम्पूर्ण वाङ्मय का अन्तर्भाव हो जाता है। ‘हितेन सह सहितं तस्य भावः साहित्यम्’ इस उत्पत्ति का आश्रय लेकर ही सम्भवतः काव्य निर्माण का एक प्रयोजन रहा है। ‘शब्दकल्पद्रुम’ में श्लोकमय ग्रन्थ को साहित्य कहा गया है- मनुष्यकृतः श्लोकमयः ग्रन्थविशेषः साहित्यम् साहित्यं शब्द ‘सहित’ शब्द से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ है परपस्पर मिला हुआ। ‘सहित्यस्यभावः साहित्यम्’1 के आधार पर शब्द और अर्थ, विचार और भाव पारस्परिक अनुकूलता के साथ सहभाव ही साहित्य है। सहित शब्द के दो अर्थ है- साथ होना, हित के साथ होना। इन अर्थांे की सिद्धि के लिए विश्वनाथ का चतुवर्गफलप्राप्तिः दृष्टनीय है। अल्पबुद्धि वालों को भी बिना किसी विशेष परिश्रम के सुख, चतुवर्ग अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूप फल प्राप्ति काव्य के ही द्वारा हो सकती है। रामायणादि काव्यों के पढ़ने से श्रीराम चन्द्रादि का अभ्युदय और रावणादि का सर्वनाश देखकर यह उपदेश मिलता है कि धर्म पर आरूढ़ रहने से अवश्य अभ्युदय होता है। जंगल के पशु-पक्षी तक भी मनुष्य की सहायता करते हैं एवं अधर्म करने के लिए कमर कसने से सगा भी छोड़ देता है और यदि इस धर्म फल की इच्छा का परित्याग कर दे तो मोक्ष की भी प्राप्ति हो सकती है, क्योंकि शुभ कर्मों के फल-त्याग और अशुभ कर्मों के अनाचरण से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।2
Published In Volume 8, Issue 1, January-February 2026
Published On 2026-02-23

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