International Journal For Multidisciplinary Research
E-ISSN: 2582-2160
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Volume 8 Issue 3
May-June 2026
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भारत में किसान की आत्महत्या का संकटः संरचनात्मक हिंसा का विश्लेषण
| Author(s) | Dr. Anita Bhatt |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | भारत प्राचीन काल से ही कृषि प्रधान देश है। कृषि क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी के रूप में सबसे महत्वपूर्ण उद्योगों में से एक है। जहाँ कृषि क्षेत्र का राष्ट्रीय आय में योगदान भारत की सकल घरेलू उत्पादन में लगभग 18 प्रतिशत का है1। भारतीय आबादी का लगभग 70 प्रतिशत प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि उद्योग पर निर्भर करता है। देश का भरण पोषण करने वाला ‘‘अन्नदाता’’ अर्थात किसान जिसकी स्थिति वर्तमान समय मंे अत्यंत शोचनीय हो गई है। प्रतिवर्ष किसान आत्महत्या से संबंधित मामले अप्रत्यशित स्तर पर दर्ज हुए हंै। भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकाॅर्ड ब्यूरो (एन.सी.आर.बी)ए भारत में आकस्मिक मौतें एवं आत्महत्याएँ रिपोर्ट (ए.डी.एस.आई) के आंकड़े बताते है कि 2019 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,281 लोगों (5,957 किसान और 4324 खेतिहर श्रमिक) ने आत्महत्याएँ की। यह संख्या देश में 2019 के आत्महत्या के कुल 1,39,123 मामलों का 7.4 प्रतिशत है। जिसमें मुख्यतः महाराष्ट्र (3,927), कर्नाटक, (1,992), आंध्र प्रदेश (1,029), मध्य प्रदेश (541), तेलंगाना (499) और छत्तीसगढ़ (499) शीर्ष छह राज्य सम्मिलित हैं। अतः इस प्रकार के परिदृश्य में भारत में किसानों की आत्महत्या एक गंभीर और चिंताजनक स्थिति की ओर इंगित करता है। इसके अनुरूप, अध्ययन के प्रमुख शोध प्रश्न हैंः भारत में किसानों और खेतिहर श्रमिक आत्महत्या के मामलों में पिछले दो दशकों में बड़े पैमाने पर वृद्धि क्यों हुई हैं? यह शोध इस उपकल्पना पर आधारित है कि भारत में किसानों की आत्महत्या आज कृषि के क्षेत्र में अंतर्निहित संकट की अभिव्यक्ति है। ध्यातव्य है कि इसी क्रम में समग्र आर्थिक विकास की नीतियों के अंतर्गत कृषि के ‘ग्रामीण आधारभूत संरचना’ के प्रतिमान में प्रबल परिवर्तन किया गया। विशेष रूप स्वातंत्र्योत्तर कृषि उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए हरित क्रांति के द्वारा फसल के प्रतिरूप में प्रथम बदलाव लाया गया। इस प्रकार से हरित क्रांति की अति उत्पादन की प्रतिस्पर्धा ने अगले 50 वर्ष के अंतराल में सम्पूर्ण कृषि व्यवस्था को बदल दिया। अतः जहाँ एक ओर तीव्रता से कृषि क्षेत्र का विकास हुआ इसी के विपरीत फसल की विविधता भी खत्म हुई। कृषि आदानों जैसे कीटनाशक और उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग ने न केवल कृषि की लागत को और अधिक बढ़ाया बल्कि प्राकृतिक व्यवस्था को भी चुनौती दी। साथ ही, इसका दुष्परिणाम मानव स्वास्थ पर भी देखा गया। परिणामजन्य इन सभी कारकों ने किसानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति के समक्ष और अधिक संकट खड़ा कर दिया। इसके अतिरिक्त, 1990 के दशक में कृषि उत्पादन के स्वरूप में पुनः प्रपांतरण देखा गया। संरचनात्मक समायोजन नीतियों के अधीन कृषि खाद्यानों के स्थान पर व्यापारिक फसलों का प्रादुर्भाव हुआ। कृषि नीति के माध्यम से जैव प्रौद्योगिकी ‘जीन क्रांति’ को बढ़ावा दिया गया। अतः राष्ट्रीय वैश्वीकरण की दोषपूर्ण आर्थिक सुधार की नीति के फलस्वरूप कृषि अर्थव्यवस्था हाशिए पर चली गई जबकि उद्योग एवं व्यापार गतिविधियां प्रमुख हो गई। वहीं दूसरी ओर संस्थानों की अप्रभावी प्रतिक्रिया भी उत्तरदायी अन्य कारकों में से एक हैं फलत निरंतर बढ़ते हुए कृषि संकट ने हाल ही के वर्षों में किसानों को आत्महत्या करने के लिए बाध्य किया है। कृषि संकट मुख्यतः सामाजिक, पर्यावरणीय एवं राजनीतिक मुद्दे के रूप में उभरा है। यह लेख गरीबी, भूखमरी और कुंठा जैसी इन सामाजिक पीड़ाओं से संघर्ष करते किसानों और उनके परिवारों पर ‘संरचनात्मक असमानता’ के रूप में निहितार्थ का विश्लेषण करता है। जिसका प्रत्यक्ष संबंध नाॅर्वेजियन समाजशास्त्री, जोहाॅन गाल्टुंग के सैद्धान्तिक बोध ‘‘संरचनात्मक हिंसा’’ से है। इस सन्दर्भ में, प्रस्तुत आलेख के माध्यम से भारत में किसानों की आत्महत्या से संबंधित समस्याओं और सुझावों को सूचीबद्ध करने का प्रयास किया गया। |
| Keywords | अर्थव्यवस्था, आत्महत्या, किसान, हरित क्रांति, खेतिहर श्रमिक, कृषि संकट, जीन क्रांति, संरचनात्मक हिंसा |
| Published In | Volume 3, Issue 4, July-August 2021 |
| Published On | 2021-08-12 |
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E-ISSN 2582-2160
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10.36948/ijfmr
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