International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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ग्रामीण वित्तीय समावेशन एवं सतत कृषि वित्तपोषण के संवर्धन में नाबार्ड (NABARD) की भूमिका का एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Author(s) Dr. Mrityunjai Singh
Country India
Abstract वित्तीय समावेशन ग्रामीण विकास के लिए एक परिवर्तनकारी कारक (Game-changer) है। प्रस्तुत अध्ययन भारत में ग्रामीण ऋण पहुंच बढ़ाने, स्वयं सहायता समूहों (SHG) के वित्तपोषण और कृषि स्थिरता सुनिश्चित करने में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) के कार्यक्रमों के प्रभाव का सूक्ष्म विश्लेषण करता है। यह शोध द्वितीयक डेटा (Secondary Data) और उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले के लाभार्थियों के सर्वेक्षण पर आधारित एक 'मिश्रित-विधि विश्लेषण' (Mixed-method analysis) का उपयोग करता है। अध्ययन नाबार्ड समर्थित कार्यक्रमों के माध्यम से ऋण पैठ (Credit Penetration), आजीविका सुरक्षा और ग्रामीण उद्यमिता के विकास का आकलन करता है। शोध के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि नाबार्ड की संस्थागत हस्तक्षेप रणनीतियों ने अनौपचारिक ऋण स्रोतों (साहूकारों) पर ग्रामीण निर्भरता को कम करने और आय स्थिरता में सुधार करने में सफलता प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त, ऋण के साथ-साथ तकनीकी नवाचार जैसे कि ड्रिप सिंचाई, सौर पंप और मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन के एकीकरण ने कृषि पारिस्थितिकी में लचीलापन (Resilience) पैदा किया है। हालाँकि, अध्ययन परिचालन संबंधी बाधाओं, जलवायु जोखिमों और डिजिटल विभाजन (Digital Divide) जैसी चुनौतियों को भी रेखांकित करता है, जो अभी भी पूर्ण वित्तीय रूपांतरण की राह में बाधक हैं। अंततः, यह पत्र समावेशी और टिकाऊ कृषि वित्त के लिए 'क्रेडिट प्लस' (Credit Plus) दृष्टिकोण और डिजिटल ग्रामीण बैंकिंग मॉडल को अपनाने का सुझाव देता है, जो न केवल ऋण वितरण बल्कि क्षमता निर्माण और बाजार लिंकेज पर भी केंद्रित हो।
Keywords नाबार्ड, वित्तीय समावेशन, टिकाऊ कृषि, ग्रामीण ऋण, स्वयं सहायता समूह (SHG), उत्तर प्रदेश, कृषि उद्यमिता।
Published In Volume 2, Issue 2, March-April 2020
Published On 2020-03-03
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2020.v02i02.74285

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