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E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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जवाहरलाल नेहरू एवं जयप्रकाश नारायण के समाजवाद का तुलनात्मक एवं आलोचनात्मक अध्ययन

Author(s) डॉ. राकेश कुमार जायसवाल
Country India
Abstract भारतीय राजनीतिक चिंतन में समाजवाद एक केंद्रीय वैचारिक प्रवृत्ति के रूप में उपस्थित रहा है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर स्वतंत्रता-उपरांत राष्ट्र-निर्माण तक की नीतियों, संस्थाओं और सामाजिक विमर्श को गहराई से प्रभावित किया। भारतीय समाजवाद का विकास यूरोपीय मार्क्सवादी परंपरा की यांत्रिक प्रतिलिपि के रूप में नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दमन, सामाजिक विषमता, ग्रामीण दरिद्रता, जातिगत पदानुक्रम, राष्ट्रीय मुक्ति संघर्ष और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के विशिष्ट भारतीय संदर्भ में हुआ। इस परिप्रेक्ष्य में जवाहरलाल नेहरू और जयप्रकाश नारायण दो ऐसे प्रमुख चिंतक एवं राजनीतिक व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने समाजवाद की भिन्न, किंतु परस्पर संवादशील धाराएँ प्रस्तुत कीं। नेहरू का समाजवाद वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लोकतांत्रिक संस्थाओं, योजनाबद्ध विकास, सार्वजनिक क्षेत्र, औद्योगिकीकरण और राज्य-नियोजित आधुनिकता पर आधारित था। इसके विपरीत जयप्रकाश नारायण का समाजवाद क्रमशः मार्क्सवादी प्रेरणाओं से विकसित होकर गांधीवादी, विकेंद्रीकृत, नैतिक, सहभागी और “संपूर्ण क्रांति” के रूप में परिपक्व हुआ, जिसमें सत्ता-संरचना के पुनर्गठन, ग्राम स्वराज, जन-भागीदारी और नैतिक पुनर्जागरण पर विशेष बल था। प्रस्तुत शोध-पत्र में नेहरू और जयप्रकाश नारायण के समाजवादी विचारों का तुलनात्मक एवं आलोचनात्मक अध्ययन किया गया है। शोध में यह प्रतिपादित किया गया है कि नेहरू का समाजवाद राष्ट्र-निर्माण की संस्थागत परियोजना के रूप में अत्यंत प्रभावशाली रहा, जिसने आधुनिक भारत की औद्योगिक, वैज्ञानिक और प्रशासनिक आधारशिला रखी, परंतु यह केंद्रीकरण, नौकरशाहीकरण, ग्रामीण उपेक्षा और सीमित सामाजिक पुनर्वितरण जैसी समस्याओं से ग्रस्त भी रहा। दूसरी ओर, जयप्रकाश नारायण का समाजवाद नैतिक एवं सहभागितामूलक लोकतंत्र का वैकल्पिक प्रतिमान प्रस्तुत करता है, परंतु इसकी आलोचना इसके अपेक्षाकृत अस्पष्ट आर्थिक कार्यक्रम, संरचनात्मक क्रियान्वयन की कठिनाइयों तथा व्यापक नीति-संस्थानीकरण की सीमाओं के आधार पर की जाती है। शोध-पत्र अंततः यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि समकालीन भारत की चुनौतियों—जैसे असमानता, लोकतांत्रिक क्षरण, स्थानीय स्वायत्तता, बेरोजगारी, सामाजिक न्याय और नैतिक-राजनीतिक संकट—के संदर्भ में नेहरूवादी संस्थागत समाजवाद और जयप्रकाशीय नैतिक-विकेंद्रीकृत समाजवाद का संतुलित समन्वय अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
Keywords समाजवाद, जवाहरलाल नेहरू, जयप्रकाश नारायण, लोकतांत्रिक समाजवाद, संपूर्ण क्रांति, विकेंद्रीकरण, ग्राम स्वराज, राष्ट्र-निर्माण, भारतीय राजनीतिक चिंतन
Published In Volume 2, Issue 1, January-February 2020
Published On 2020-01-05
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2020.v02i01.74635

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