International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

A Widely Indexed Open Access Peer Reviewed Multidisciplinary Bi-monthly Scholarly International Journal

Call for Paper Volume 8, Issue 5 (September-October 2026) Submit your research before last 3 days of October to publish your research paper in the issue of September-October.

भारत के जनजातीय समाज में श्री राम के प्रति आस्था का 2014 के लोकसभा चुनाव पर प्रभाव

Author(s) डॉ. राकेश कुमार जायसवाल
Country India
Abstract भारत का जनजातीय समाज अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं, प्रकृति-आधारित जीवनदृष्टि और सामुदायिक संगठन के कारण भारतीय सामाजिक संरचना का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटक है। ऐतिहासिक रूप से जनजातीय समुदायों की धार्मिक पहचान को अक्सर प्रकृति-पूजा, पूर्वज-पूजा, टोटेमवाद, स्थानीय देवताओं और विशिष्ट लोकविश्वासों से जोड़ा गया है। फिर भी भारत की दीर्घकालिक सांस्कृतिक प्रक्रियाओं में जनजातीय समाज और व्यापक हिंदू सांस्कृतिक परंपरा के बीच विभिन्न स्तरों पर संपर्क, आदान-प्रदान, समन्वय और पुनर्व्याख्या होती रही है। इसी परिप्रेक्ष्य में श्री राम, रामकथा, रामायण, शबरी, निषादराज, वनवास और वनांचल से जुड़े प्रसंग जनजातीय समुदायों और राम की सांस्कृतिक छवि के बीच संबंध स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण रहे हैं। बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में यह सांस्कृतिक संबंध केवल धार्मिक आख्यान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पहचान-राजनीति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, धार्मिक लामबंदी और चुनावी रणनीतियों में भी प्रयुक्त होने लगा। 2014 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ के रूप में सामने आया। इस चुनाव में विकास, भ्रष्टाचार-विरोध, सशक्त नेतृत्व और परिवर्तन की आकांक्षा जैसे मुद्दे अत्यंत प्रमुख थे। इसके साथ ही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और व्यापक हिंदू पहचान का विमर्श भी अप्रत्यक्ष रूप से सक्रिय था। यद्यपि राम मंदिर का प्रश्न 2014 के चुनावी घोषणापत्र और प्रचार के केंद्र में उतनी प्रत्यक्षता से नहीं था जितना बाद के वर्षों में दिखाई दिया, फिर भी श्री राम की सांस्कृतिक उपस्थिति और राम से जुड़ी प्रतीकात्मक राजनीति ने अनेक क्षेत्रों में भावनात्मक और सांस्कृतिक वातावरण को प्रभावित किया। जनजातीय बहुल क्षेत्रों में यह प्रभाव विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि वहाँ सांस्कृतिक समावेशन, धार्मिक पुनर्परिभाषा और राजनीतिक लामबंदी की प्रक्रियाएँ पहले से सक्रिय थीं। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि भारत के जनजातीय समाज में श्री राम के प्रति आस्था ने 2014 के लोकसभा चुनावों में किस सीमा तक और किस प्रकार मतदान व्यवहार को प्रभावित किया। अध्ययन का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि जनजातीय समाज में श्री राम के प्रति आस्था ने चुनावों को प्रत्यक्ष रूप से निर्णायक रूप में नियंत्रित नहीं किया, किंतु उसने सांस्कृतिक पहचान के निर्माण, राजनीतिक स्वीकार्यता के विस्तार, हिंदू प्रतीकात्मक एकता के संदेश और कुछ क्षेत्रों में भाजपा के सामाजिक विस्तार के लिए एक सहायक वैचारिक-सांस्कृतिक आधार अवश्य प्रदान किया। यह प्रभाव एक समान, सर्वव्यापी या एकरेखीय नहीं था; बल्कि राज्यवार, क्षेत्रवार और समुदायवार भिन्न रूपों में प्रकट हुआ। इसलिए 2014 के चुनाव में जनजातीय मतदान को केवल धार्मिक आस्था से समझना उचित नहीं होगा; विकास, नेतृत्व, कल्याण, स्थानीय मुद्दे, क्षेत्रीय राजनीति और संगठनात्मक कार्य भी समान रूप से महत्वपूर्ण थे। फिर भी यह अध्ययन दर्शाता है कि श्री राम का सांस्कृतिक प्रतीक जनजातीय समाज और चुनावी राजनीति के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु के रूप में कार्य करता रहा।
Keywords जनजातीय समाज, श्री राम, लोकसभा चुनाव 2014, मतदान व्यवहार, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, आदिवासी राजनीति, शबरी, पहचान-राजनीति
Published In Volume 2, Issue 4, July-August 2020
Published On 2020-07-03
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2020.v02i04.74637

Share this