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E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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नवउदारवादी युग में अंबेडकर का सामाजिक लोकतंत्र : बाजार, राज्य और सामाजिक न्याय के सन्दर्भ में

Author(s) डॉ. राकेश कुमार जायसवाल
Country India
Abstract भारत में 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद राज्य, बाजार और समाज के बीच संबंधों का चरित्र गहरे रूप में बदला है। उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों ने विकास, दक्षता, निवेश और उपभोक्तावाद की नई भाषा निर्मित की, जिसके साथ कल्याणकारी राज्य, पुनर्वितरण और सामाजिक न्याय की पारंपरिक अवधारणाएँ चुनौती के घेरे में आईं। इस संदर्भ में डॉ. भीमराव अंबेडकर का सामाजिक लोकतंत्र का विचार अत्यंत प्रासंगिक हो उठता है, क्योंकि उनके लिए लोकतंत्र केवल राजनीतिक संस्थाओं की व्यवस्था नहीं था, बल्कि वह स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व पर आधारित जीवन-पद्धति था। अंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि यदि राजनीतिक लोकतंत्र के साथ सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र नहीं जुड़ा, तो लोकतंत्र का ढाँचा खोखला हो जाएगा। यह शोधपत्र इसी केंद्रीय प्रश्न की पड़ताल करता है कि क्या नवउदारवादी बाजार-आधारित विकास मॉडल अंबेडकर के सामाजिक न्याय और सामाजिक लोकतंत्र की आकांक्षा को पूरा कर सकता है, या वह उसे और अधिक जटिल बनाता है। अध्ययन का मुख्य तर्क यह है कि नवउदारवाद ने भारत में राजनीतिक प्रतिनिधित्व, उपभोग, उद्यमिता और मध्यवर्गीय अवसरों का विस्तार अवश्य किया, किंतु उसने सामाजिक लोकतंत्र के लिए आवश्यक संरचनात्मक समानता का निर्माण नहीं किया। सार्वजनिक क्षेत्र के सिकुड़ने, सरकारी नौकरियों में कमी, निजी क्षेत्र में आरक्षण के अभाव, शिक्षा और स्वास्थ्य के बढ़ते निजीकरण, श्रम सुरक्षा के क्षरण तथा भूमि और संसाधनों पर कॉरपोरेट नियंत्रण के विस्तार ने दलितों, आदिवासियों, पिछड़े वर्गों और अन्य वंचित समुदायों की न्यायपूर्ण हिस्सेदारी को बाधित किया। इस प्रक्रिया में अंबेडकर के ‘एक व्यक्ति एक वोट’ से आगे बढ़कर ‘एक व्यक्ति एक मूल्य’ के आदर्श को गंभीर ठेस पहुँची है। यद्यपि नवउदारवादी दौर में दलित उद्यमिता, अधिकार-आधारित कानूनों और पहचान-आधारित राजनीति के कुछ सकारात्मक आयाम भी उभरे हैं, परंतु वे व्यापक सामाजिक-आर्थिक समता की भरपाई नहीं कर सके। यह शोधपत्र अंबेडकर के सामाजिक लोकतंत्र की सैद्धांतिक व्याख्या, नवउदारवाद की मूल मान्यताओं, उदारीकरणोत्तर भारत की नीतिगत संरचना, आरक्षण, श्रम, शिक्षा, भूमि, कल्याणकारी राज्य और संवैधानिक नैतिकता के आयामों का विश्लेषण करता है। निष्कर्षतः यह प्रतिपादित किया गया है कि अंबेडकरवादी सामाजिक न्याय के लिए राज्य की पुनर्वितरणकारी, संरक्षक और नियामक भूमिका अपरिहार्य है। बाजार को पूर्णतः अस्वीकार करने के बजाय उसे सामाजिक न्याय-सापेक्ष, संवैधानिक नैतिकता-नियंत्रित और सकारात्मक कार्रवाई से युक्त ढाँचे में रखना ही अधिक उपयुक्त दिशा हो सकती है। अन्यथा सामाजिक-आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र के टिके रहने पर वही संकट मंडराएगा जिसकी चेतावनी अंबेडकर ने संविधान सभा में दी थी।
Keywords सामाजिक लोकतंत्र, नवउदारवाद, अंबेडकर, सामाजिक न्याय, आरक्षण, निजीकरण, कल्याणकारी राज्य, संवैधानिक नैतिकता, दलित उद्यमिता, बंधुत्व
Published In Volume 3, Issue 1, January-February 2021
Published On 2021-02-04
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2021.v03i01.75042

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