International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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प्राचीन वैदिक साहित्य मे पर्यावरणी उल्लेख का ऐतिहासिक विश्लेषण

Author(s) पारस अग्रवाल
Country India
Abstract भारतीय ज्ञान परंपरा में पर्यावरण को एक अभिन्न अंग माना गया है, जिसमें प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण और नैतिक संबंध पर जोर दिया गया है। यह आधुनिक भौतिकवादी दृष्टिकोण के विपरीत है, जो प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु मानता है। इस परंपरा में पर्यावरण को जीवंत माना जाता है, जहाँ मनुष्य एक जटिल पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा है, न कि उसका मालिक। भारतीय ग्रंथों में प्रकृति के साथ एक संतुलित जीवन जीने की शिक्षा दी गई है। प्रकृति का दोहन केवल आवश्यकतानुसार करने का सुझाव है, न कि लालचवश, क्योंकि अत्यधिक उपभोग असंतुलन पैदा कर सकता है। प्राचीन भारतीय ज्ञान, जैसे कि वेद और उपनिषद, बताते हैं कि सृष्टि पाँच पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाशे बनी है। इन तत्वों में से किसी एक में भी प्रदूषण या असंतुलन होने पर उसका नकारात्मक प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है। पवित्रता और दिव्यताः भारतीय दर्शन में, प्रकृति को पवित्र और दिव्य माना गया है। भारतीय संस्कृति में पेड़ों और जानवरों को विशेष महत्व दिया जाता है। पीपल, वटवृक्ष, नीम और तुलसी जैसे वृक्षों को पवित्र माना जाता है, जो वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाभकारी हैं। विभिन्न जीव-जंतुओं के प्रति भी सह-अस्तित्व और प्रेम का भाव रहा है। ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः‘ जैसे मंत्र सभी के कल्याण की कामना करते हैं, जिसके लिए प्रदूषण रहित और शुद्ध पर्यावरण आवश्यक है। आज के दौर में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकटों से जूझ रही है, भारतीय ज्ञान परंपरा के ये सिद्धांत महत्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। टिकाऊ जीवनशैली, प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग और प्रकृति के प्रति सम्मान जैसे विचार आधुनिक पर्यावरणीय चुनौतियों का समाधान करने में सहायक हो सकते हैं।
Keywords पर्यावरण, आवरण, संरक्षण, प्रकृति, प्राकृतिक, मानव
Field Arts
Published In Volume 8, Issue 2, March-April 2026
Published On 2026-04-28

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