International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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संरचनात्क-प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण और महिला स्थिति

Author(s) Dr. मीनाक्षी मीना
Country India
Abstract यह शोध-पत्र संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक दृष्टिकोण के आधार पर समाज में महिलाओं की स्थिति का विश्लेषण करता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार समाज एक संगठित तंत्र है, जिसमें प्रत्येक संस्था और भूमिका का एक विशेष कार्य (थ्नदबजपवद) होता है। महिलाओं की पारंपरिक भूमिकाओं को सामाजिक स्थिरता और संतुलन के लिए आवश्यक माना गया है। यह अध्ययन इस दृष्टिकोण की विशेषताओं, सीमाओं तथा आधुनिक संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता का विश्लेषण करता है।
भारतीय समाज में जाति संरचना लाक्षणिक रुप से क्षैतिज वर्गों अथवा जाति-स्तरों से बनती है जिसके समाज में अपने ही प्रकार्य हैं। इनकी श्रेणीबद्धता का मूल आधार समाज की आवश्यकताओं के अनुसार निर्मित होता है। पारम्परिक रूप में भारतीय जाति व्यवस्था एक कठोर संस्तरणीय व्यवस्था रही है। जातियों की असमानताओं की इस संरचना में महिलाओं का क्या स्थान है? इसका अध्ययन आवश्यक है। जिस प्रकार ऊंची और नीची जातियों के संदर्भ सारी संरचनाओं से उभर जाते हैं और जिस प्रकार से आर्थिक संरचनाओं के आधार पर जातियों और वर्गों के बीच बहुत अधिक असमानता दिखाई नहीं देती, महिलाओं की प्रस्थितियां जाति आधारों पर असमानता की संरचना में कैसे देखी जा सकती है? यह विचार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि निम्न जातियों के साथ महिलाओं को भी समाज में कमजोर वर्ग की तरह स्वीकारा जाता है। क्या जाति संरचना महिलाओं की प्रस्थिति के संदर्भ में, महिलाओं के लिए किसी विशिष्टता का निर्माण करती है? प्रस्तुत लेख इसी संदर्भ से जुड़ा है।
Keywords जाति संरचना, लैगिंक असमानता, स्तरीकरण, सशक्तीकरण, नारीवाद
Published In Volume 4, Issue 6, November-December 2022
Published On 2022-12-09

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