International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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वैश्विक पर्यावरणीय संकट के दौर मे गाँधी जी के स्वदेशी आन्दोलन की प्रासंगिकता

Author(s) Mr. Ramawatar Meena, Dr.Vipin Patel, Akhilesh Kumar Singh
Country India
Abstract सार-
पर्यावरण संरक्षण पर गाँधी जी का सार्थक कथन "पृथ्वी हर व्यक्ति की जरूरतों पूरी करने में समर्थ है किंतु हर एक का लालच पूरा करने में नहीं" राष्ट्रपिता के इस कथन को दिशानिर्देशक मानकर व्यक्ति नीजि तौर पर अपनी आवश्यकताओं को ( सीमित रखने को प्रेरित हो सकता है किंतु विगत 100 वर्षों में तकनीकी व वैज्ञानिक प्रगति के कारण उत्पादन की विधियाँ बदली है उत्पादन के संबंध बदले है जिससे समाज में अनेक परिवर्तन आये है एक समय जो मांग आधारित अर्थव्यवस्था थी वो पूर्ति आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो गई है। वैश्वीकरण के दौर के चलते हमारे बाजारों में विदेशी उत्पादों की भरमार हो गई है ऐसे में स्थानीय लघु एवं मध्यम उद्योगों एवं स्थानीय उत्पादन पर बुरा असर पड़ा है। जो कि उत्तर औद्योगिक समाज बनने की होड़ एवम लोगों में बढ़ती स्वार्थपरता का परिणाम है।
Keywords पर्यावरण , स्वदेशी ,आन्दोलन ,अहिंसा ,स्वावलंबन,स्वराज्य,
Published In Volume 8, Issue 4, July-August 2026
Published On 2026-07-04
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i04.82988

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