International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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पश्चिमी यथार्थवाद से पूर्व : कौटिल्य, महाभारत और नीति ग्रंथों में वर्णित ‘राजमण्डल’ और ‘सप्तांग’ सिद्धांतों की समकालीन प्रासंगिकता ।

Author(s) Mr. Dhananjay Dubey, Prof. Dr. Mamta Mani Tripathi
Country India
Abstract भारतीय राजनैतिक दर्शन की ऐतिहासिकता को आधार मानते हुए यह शोध पत्र कूटनीति, युद्ध और अंतरराज्यीय संबंधों जैसे समकालीन विषयों का शास्त्रीय भारतीय राजनैतिक संस्कृति एवं प्रतिमानों के आधार पर एक विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है, जो मुख्य रूप से कौटिल्य के अर्थशास्त्र, महाभारत के शांति पर्व, कामंडक के नीतिसार तथा शुक्रनीति में वर्णित विचारों पर आधारित है। केंद्रीय रूप से यह अध्ययन मानता है कि प्राचीन भारतीय राजनीतिक विचार ने जो एक उत्कृष्ट, बहुस्तरीय यथार्थवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है, वह पश्चिमी शास्त्रीय यथार्थवाद से 1000 वर्ष से भी अधिक पूर्व का है। राजमण्डल सिद्धांत, राज्य शक्ति के सप्तांग मॉडल और षड्गुण्य नीति का विश्लेषण करते हुए यह अध्ययन एक ऐसी विश्वदृष्टि को प्रस्तुत करता है, जहाँ राज्य का संरक्षण और धर्म की स्थापना दण्ड-नीति (शासन) के अभ्यास के माध्यम से एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। यह शोध आगे धर्म-युद्ध और कूट/भ्रामक युद्ध के बीच उपस्थित नैतिक तनाव की भी जाँच करता है तथा यह समझने का प्रयास करता है कि एक अराजक अंतरराष्ट्रीय प्रणाली में अस्तित्व की व्यावहारिक आवश्यकताओं को समायोजित करने के लिए रणनीतिक विचार कैसे विकसित हुए। अंततः यह शोध पत्र 1962 के चीन-भारत युद्ध और आधुनिक बहु-संरेखित कूटनीति जैसे समकालीन भू-राजनीतिक संदर्भों पर इन स्वदेशी अवधारणाओं को लागू करके उनकी स्थायी प्रासंगिकता को प्रदर्शित करता है। इस शोधपत्र के माध्यम से यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि भारतीय रणनीतिक संस्कृति में यथार्थवाद के साथ एक “नैतिक संतुलन” निहित है, जो इसे विशिष्ट बनाता है
Keywords राजमण्डल सिद्धांत, अर्थशास्त्र,नीति शास्त्र धर्म-युद्ध, षड्गुण्य नीति, रणनीतिक यथार्थवाद।
Field Sociology > Politics
Published In Volume 8, Issue 4, July-August 2026
Published On 2026-07-19
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i04.84035

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