International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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जन सहभागिता का बदलता परिदृश्य : भारत में पारंपरिक जनमंचों से डिजिटल सक्रियता तक (2020–21 के किसान आंदोलन के विशेष संदर्भ में)

Author(s) Dr. Deeksha Singh
Country India
Abstract लोकतांत्रिक राजनीति में जन सहभागिता सिर्फ वोट देने से अभिव्यक्त नहीं हो सकता। बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक गतिशीलता इस बात से भी तय होनी चाहिए कि नागरिक अपनी समस्याओं, देश के व्यापक हितों पर कितनी मुखरता से अपनी बात रखते हैं। सरकार की नीतियों की आलोचना- समालोचना करते हैं। सामूहिक रूप से अपनी मांगें उठाते हैं और आवश्यकता पड़ने पर सरकारी नीतियों का अहिंसक विरोध करते हैं। भारत में जन सहभागिता की अपनी गहरी परंपरा रही है। ग्रामसभा, ग्राम पंचायत, ग्राम चौपाल, खाप, किसान सभा,किसान यूनियन, श्रमिक संगठन, सामुदायिक बैठक, जनसभा, जुलूस और धरना जैसे मंचों ने लंबे समय तक राजनीतिक विचारों के निर्माण और सामूहिक कार्रवाई के लिए आधार तैयार किया है।
1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय समाज की राजनीतिक और सामाजिक व्यवहार में आमूलचूल बदलाव देखने को मिले हैं। जहाँ बाजार, मीडिया और संचार तकनीक का प्रसार हुआ। वहीं मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने जन संवाद को एक नवीन माध्यम दिया। अब राजनीतिक सूचना के लिए नागरिक केवल अखबार, रेडियो, टेलीविजन या प्रत्यक्ष बैठकों पर निर्भर नहीं रहे। WhatsApp समूह, Facebook, YouTube, Twitter/X, Instagram और Telegram जैसे मंचों ने राजनीतिक संदेशों के प्रसार और नागरिक लामबंदी के लिए नए अवसर उपलब्ध कराए। प्रस्तुत शोध पत्र भी इस परिवर्तन को केवल माध्यम का परिवर्तन न मानकर सामाजिक, राजनीतिक और संरचनात्मक बदलाव की प्रक्रिया के रूप में देखता है।
2020–21 का किसान आंदोलन इस बदलाव को समझने के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुआ आंदोलन कुछ ही समय में व्यापक राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बन गया। इसकी जड़ें किसान संगठनों, ग्रामीण सामाजिक नेटवर्क, पंचायतों, सामुदायिक संबंधों और प्रत्यक्ष धरना-प्रदर्शन की राजनीति में थीं, लेकिन आंदोलन की सूचना, छवि और संदेश को व्यापक स्तर पर फैलाने में डिजिटल माध्यमों की भूमिका भी दिखाई दी। सिंघू, टिकरी और अन्य सीमा स्थलों पर चल रहे भौतिक आंदोलन और सोशल मीडिया पर चल रहे विमर्श अलग-अलग प्रक्रियाएँ नहीं थे। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे थे।
यह पत्र इसी संबंध को समझने का प्रयास करता है। इसमें जन सहभागिता के पारंपरिक रूपों, 1991 के बाद हुए डिजिटल सक्रियता, किसान आंदोलन की राजनीतिक संरचना, सार्वजनिक क्षेत्र, सामाजिक पूँजी, संसाधन जुटाव, फ्रेमिंग और नेटवर्क समाज जैसी अवधारणाओं के आधार पर विश्लेषण किया गया है। शोध पत्र का प्रमुख तर्क यह है कि डिजिटल सक्रियता ने पारंपरिक जनमंचों को समाप्त नहीं किया है। इसके बजाय दोनों के बीच एक नया संबंध उभरा है, जिसमें सामाजिक संगठन और भौतिक उपस्थिति को डिजिटल संचार गति, विस्तार और दृश्यता प्रदान करता है। साथ ही डिजिटल माध्यम जन सहभागिता को अधिक समान और लोकतांत्रिक बनाने की संभावना के साथ नई विषमताएँ और नियंत्रण की समस्याएँ भी पैदा करते हैं।
Keywords जन सहभागिता जनमंच डिजिटल सक्रियता किसान आंदोलन सोशल मीडिया सामाजिक आंदोलन डिजिटल विभाजन
Field Sociology > Politics
Published In Volume 8, Issue 4, July-August 2026
Published On 2026-08-16
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i04.85911

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