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E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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क्षेत्रीय इतिहास का राष्ट्रीयकरणः भंवरलाल नाथूराम लूणिया की शोध-दृष्टि और ऐतिहासिक प्रतिमान

Author(s) राजेंद्र सिंह मेवाडा
Country India
Abstract भारतीय इतिहास-लेखन के विशाल फलक पर क्षेत्रीय इतिहास को प्रायः मुख्यधारा के वृत्तांतों और राष्ट्रीय आख्यानों की छाया में ही देखा जाता रहा है। लंबे समय तक इतिहास-लेखन सत्ता के केंद्रों (जैसे दिल्ली या मगध) तक ही सीमित रहा, जिसके कारण क्षेत्रीय संघर्षों, स्थानीय संस्कृतियों और जन-आंदोलनों को वह राष्ट्रीय पहचान नहीं मिल सकी जिसके वे वास्तविक अधिकारी थे। परंतु, मध्य भारत और विशेषकर मालवा के संदर्भ में इस एकांगी धारणा को बदलने वाले अग्रणी विद्वानों में इतिहासकार प्रोफेसर भंवरलाल नाथूराम लूणिया का नाम सर्वोच्च स्थान पर आता है। उनका यह अत्यंत स्पष्ट और अकाट्य मत था कि जब तक क्षेत्रीय इतिहास की नींव मजबूत नहीं होगी, तब तक राष्ट्रीय इतिहास का विशाल भवन सदैव अपूर्ण ही रहेगा। प्रो. बी.एन. लूणिया का क्षेत्रीय इतिहास के प्रति दृष्टिकोण केवल राजाओं की वंशावलियों या घटनाओं की तिथिवार सूची तैयार करना नहीं था। इसके विपरीत, वे इतिहास को एक जीवित, गतिशील और साक्ष्य-आधारित विधा मानते थे। उनके ऐतिहासिक दर्शन में ‘क्षेत्र‘ मात्र एक भौगोलिक इकाई नहीं थी, बल्कि वह उन अनगिनत संघर्षों, सांस्कृतिक परंपराओं और बलिदानों की पवित्र भूमि थी, जिसने समग्र राष्ट्र-निर्माण में अपनी मौन आहुति दी थी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राष्ट्रीय इतिहास की जटिलताओं और उसकी समग्रता को समझने के लिए क्षेत्रीय इतिहास की गहराइयों का वैज्ञानिक अन्वेषण नितांत आवश्यक है। उनके इस प्रखर क्षेत्रीय इतिहास-बोध के निर्माण में नटनागर शोध संस्थान, सीतामऊ के संस्थापक और भारत के मूर्धन्य इतिहास-विद्वान महाराज कुमार रघुवीर सिंह जी का अत्यंत गहरा और प्रेरणादायी प्रभाव विद्यमान था। महाराज कुमार के इस वैचारिक निर्देश को कि ‘‘मालवा के इतिहास के लिए छात्रों को तैयार करो, केवल गप्पबाजी से काम नहीं चलेगा,‘‘ लूणिया जी ने अपने संपूर्ण अकादमिक जीवन का परम ध्येय बना लिया। इतिहास-लेखन में प्रो. लूणिया की सबसे बड़ी विशिष्टता प्राथमिक स्रोतों के प्रति उनकी अटूट निष्ठा थी। उन्होंने क्षेत्रीय इतिहास को लोक-कथाओं या द्वितीयक स्रोतों के धुंधलके से निकालकर ठोस पुरालेखीय साक्ष्यों की रोशनी में खड़ा किया। ग्वालियर, इंदौर, देवास और धार जैसी रियासतों के तहखानों में उपेक्षित पड़े ‘मोड़ी लिपि‘ और मराठी भाषा के ऐतिहासिक दस्तावेजों, अदालती मुकदमों और डायरियों का उन्होंने न केवल अन्वेषण किया, बल्कि उनका अत्यंत सावधानीपूर्वक अनुवाद करवाकर उन्हें अकादमिक विमर्श का हिस्सा बनाया। उनकी इसी वैज्ञानिक शोध-प्रविधि ने मालवा के इतिहास विशेषकर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में मालवा की जनजातियों (भील, भिलाला), बंजारों और स्थानीय जागीरदारों की भूमिका को राष्ट्रीय इतिहास की मुख्यधारा से जोड़ने का ऐतिहासिक कार्य किया। उन्होंने अपने शिष्यों (जैसे डॉ. जे.सी. उपाध्याय) के माध्यम से मालवा के इतिहास पर विपुल शोध कार्य करवाकर एक ऐसी सुदृढ़ अकादमिक परंपरा की नींव रखी, जिसने मालवा को वैश्विक पटल पर प्रतिष्ठापित कर दिया।
Keywords भारतीय इतिहास,संघर्ष, स्थानीय, संस्कृति, जन-आंदोलन,साक्ष्य-आधारित,भील, भिलाला,
Field Arts
Published In Volume 8, Issue 4, July-August 2026
Published On 2026-08-20

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