International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

A Widely Indexed Open Access Peer Reviewed Multidisciplinary Bi-monthly Scholarly International Journal

Call for Paper Volume 8, Issue 5 (September-October 2026) Submit your research before last 3 days of October to publish your research paper in the issue of September-October.

भारतीय संदर्भ में सामाजिक न्याय की अवधारणा: बी. आर. अंबेडकर का अध्ययन

Author(s) Mr. नरेंद्र कुमार जाट, Prof. Dr. सोमवती शर्मा
Country India
Abstract सामाजिक न्याय आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला है, जो प्रत्येक नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा के साथ जीवन जीने का अवसर सुनिश्चित करता है। भारतीय संदर्भ में यह अवधारणा विशेष महत्व रखती है, क्योंकि यहाँ की सामाजिक संरचना सदियों से जाति-आधारित असमानता, अस्पृश्यता और भेदभाव से ग्रस्त रही है। इस पृष्ठभूमि में डॉ. भीमराव अंबेडकर का चिंतन सामाजिक न्याय की भारतीय अवधारणा को एक ठोस सैद्धांतिक और व्यावहारिक आधार प्रदान करता है। अंबेडकर के अनुसार सामाजिक न्याय केवल आर्थिक या राजनीतिक समानता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के त्रिविध मूल्यों पर आधारित एक जीवन-पद्धति है। प्रस्तुत आलेख का उद्देश्य सामाजिक न्याय की सैद्धांतिक पृष्ठभूमि, भारतीय सामाजिक व्यवस्था में व्याप्त अन्याय के स्वरूप, अंबेडकर की सामाजिक न्याय की संकल्पना, इसके मूल तत्वों, तथा इसकी प्राप्ति के लिए उनके द्वारा अपनाए गए साधनों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करना है। साथ ही, संविधान में समाहित सामाजिक न्याय के प्रावधानों और समकालीन भारत में इस अवधारणा की प्रासंगिकता पर भी विचार किया गया है। अध्ययन यह दर्शाता है कि अंबेडकर की सामाजिक न्याय की परिकल्पना आज भी अधूरी है और उसे व्यवहार में उतारने के लिए निरंतर सामाजिक, शैक्षिक और संस्थागत प्रयासों की आवश्यकता है।
Keywords सामाजिक न्याय, बी. आर. अंबेडकर, समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, जाति व्यवस्था, अस्पृश्यता, भारतीय संविधान, मानव गरिमा, लोकतंत्र।
Field Sociology
Published In Volume 8, Issue 5, September-October 2026
Published On 2026-09-21

Share this