International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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देबप्रसाद दास परंपरा में मूल ओडिसी का पुनरुत्थान

Author(s) Monidipa Ghosh, Raja Ravi Goutam
Country India
Abstract ओडिसी नृत्य को जनसाधारण सामान्यतः हिन्दुस्तानी शास्त्रीय नृत्य के अंतर्गत जानता ही है, परंतु बहुत कम लोगों को इस नृत्य की विभिन्न शैलियों और परम्पराओं का ज्ञान है। विभिन्न गुरुओं द्वारा अलग-अलग शैली और कला के प्रयोग के कारण ओडिसी नृत्य में बहुत विविधताएं हैं, उन विविधताओं के आधार पर ओडिसी नृत्य की तीन प्रमुख परम्पराएं मानी गईं हैं, नामतः गुरु पंकज चरण दास परंपरा, गुरु केलूचरण महापात्र परंपरा और गुरु देबप्रसाद दास परंपरा। इन तीनों परम्पराओं में गुरु केलूचरण महापात्र की शैली को ही जनसाधारण मूल-ओडिसी के रूप में पहचानती है और मान्यता देती है। वहीं गुरु देबप्रसाद दास परंपरा की नृत्य शैली अपनी कला, दर्शन और सभी रसों की यथोचित अभिव्यक्ति के कारण विद्रोही प्रकृति की है। क्योंकि गुरु केलूचरण महापात्र की परंपरा लोगों के बीच प्रचलित है और गुरु देबप्रसाद दास की नृत्य शैली इस प्रचलित परंपरा की विरोधी है इसलिए गुरु देबप्रसाद दास की नृत्य शैली को वह स्थान प्राप्त नहीं है जिसकी वह योग्यता रखती है। चूंकी गुरु देबप्रसाद दास को तंत्र और शैव परंपरा के प्रति गहरा लगाव और अनुराग था इसलिए उनकी शैली को शैव ओडिसी के नाम से जाना जाता है। इस शैली मे वीर रस और श्रृंगार रस के साथ-साथ उन रसों की विशेष महात्ता है जिन्हें साधारणतः उपेक्षित और अप्रिय प्रकृति का माना जाता है, यथा, रौद्र रस, विभात्स रस और भयानक रस। यह शैली तथाकथित अप्रिय रसों को उच्च स्थान प्रदान करती है और उन पर नृत्यरचना ;बीवतमवहतंचीलद्ध करती है। इस लेख का उद्देश्य गुरु देबप्रसाद दास की नृत्य की क्रांतिकारी प्रकृति को अभिव्यक्त करते हुए तथाकथित अप्रिय रसों के साथ-साथ गुरु देबप्रसाद दास की कुछ प्रसिद्ध नृत्यरचनाओं का विश्लेषण करना है। यह लेख इस क्रांतिकारी, अद्वितीय और साहसी नृत्य शैली का शाब्दिक उत्सव है।
Keywords नाट्यशास्त्र, सौंदर्यशास्त्र, शैव ओडिसी, तंत्र, नृत्य-दर्शन
Field Arts
Published In Volume 5, Issue 2, March-April 2023
Published On 2023-03-23
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2023.v05i02.1976

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