International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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परियत्ति और पटिपत्तिः एक संक्षिप्त विश्लेषण

Author(s) Dr. Prem Datta Singh Medhankar
Country India
Abstract परियत्ति और पटिपत्तिः एक संक्षिप्त विश्लेषण
डॉ. प्रेम दत्त सिंह मेधंकर
बौद्ध अध्ययन विभाग
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली
बुद्ध धम्म के परियत्ति, पटिपत्ति और पटीवेध ये तीन महत्वपूर्ण अंग है। यदि परियत्ति भगवान द्वारा उपदेशित धर्म है, तो पटिपत्ति बुद्ध धम्म का व्यावहारिक पक्ष है, और पटिवेध आन्तरिक अनुभूति है। बोधिसत्त्व जब आलार कालाम व उद्दक रामपुत्र से साधना सीखते हैं तो वे पहले ज्ञान प्राप्त करते हैं, जिसे परियत्ति कहते हैं। फिर निरञ्जरा नदी के किनारे उरूवेला में साधना करते हैं, जिसे पटिपत्ति कहते हैं, तब जाकर अनुभव प्राप्त होता है, जिसे पटिवेध कहते हैं। धम्म की स्थिरता केवल परियत्ति पर निर्भर है। यदि बुद्धवचन सुरक्षित है तो आचरण और अनुभव भी सम्भव है। जिस प्रकार मजबूत तटबंध वाला तालाब सूखता नहीं, उसी प्रकार तिपिटक रूपी परियत्ति सुरक्षित हो तो धम्म भी सुरक्षित रहेगा। परियत्ति (बुद्धवचन) की रक्षा धम्म की रक्षा है। जब परियत्ति लुप्त होती है, तब पटिपत्ति और पटिवेध भी लुप्त होते हैं। अत: बिना परियत्ति के पटिपत्ति और पटिवेध असंभव हैं। भगवान कहते हैं कि सच्चे धर्म को सुनना भी संसार में दुर्लभ है, परियत्ति, पटिपत्ति और पटिवेध ये तीन सच्चे धर्म हैं। जो शास्त्र, आचरण और अनुभव के रूप में प्रकट होते हैं। यदि शास्त्र रूपी धर्म नहीं होगा, तो प्रत्यक्ष अनुभव कभी संभव नहीं होगा। जब शास्त्र लुप्त हो जाते है, तब आचरण भी लुप्त हो जाता है; और जब आचरण समाप्त होता है, तब अनुभव भी लुप्त हो जाता है। इसका कारण यह है कि परियत्ति (शास्त्र) ही आचरण का कारण होता है। आचरण और अनुभव के लिए भी शास्त्र ही प्रमाण और मापक है। क्योंकि जब परियत्ति लुप्त हो जाती है, तब आचरण भी नष्ट हो जाता है, और जब आचरण नष्ट हो जाता है, तब अनुभूति भी नहीं रह पाती। इस प्रकार परियत्ति शास्त्र है, पटिपत्ति साधना है और पटिवेध अनुभव है। तथा बिना परियत्ति के न तो सही साधना संभव है, न ही अनुभवजन्य बोध।
Keywords परियत्ति और पटिपत्ति
Field Arts
Published In Volume 7, Issue 4, July-August 2025
Published On 2025-08-02
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i04.52594

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