International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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Call for Paper Volume 8, Issue 3 (May-June 2026) Submit your research before last 3 days of June to publish your research paper in the issue of May-June.

Importance of Sanskrit language in Ayurveda

Author(s) Mr. JENISHKUMAR MANHARBHAI SURATI
Country India
Abstract यह शोध-पत्र आयुर्वेद में संस्कृत भाषा की अनिवार्यता और उसकी मूलभूत भूमिका पर प्रकाश डालता है। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता तथा अष्टांग हृदय जैसे प्रमुख आयुर्वेदिक ग्रंथ पूर्णतः संस्कृत में रचित हैं, जिनमें चिकित्सा-विज्ञान के साथ-साथ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक सिद्धांतों का भी समावेश है। संस्कृत की व्याकरणिक शुद्धता, वैज्ञानिकता तथा ध्वनि-संरचना आयुर्वेदिक ज्ञान के विश्लेषण, संप्रेषण और संरक्षण में विशिष्ट योगदान प्रदान करती है।
आयुर्वेद के अनेक मूलभूत सिद्धांत जैसे अग्नि, दोष, धातु और ओजस के गूढ़ अर्थ केवल संस्कृत की निरुक्ति और संदर्भ में ही स्पष्ट होते हैं। संस्कृत-व्याकरण का गहन ज्ञान औषधियों के नाम, रोगों के वर्गीकरण, निदान-प्रक्रिया तथा चिकित्सा-पद्धति की सटीक व्याख्या के लिए अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, पर्यायवाची शब्दों की समृद्धता और समास-रचना आयुर्वेद के सूत्रात्मक लेखन को सशक्त बनाती है।
संस्कृत की ध्वन्यात्मक विशेषताओं ने मौखिक परंपरा में ज्ञान-संरक्षण को सरल और विश्वसनीय बनाया। साथ ही, आयुर्वेद के दार्शनिक आधार जैसे प्रकृति, पुरुष, अहंकार और मनस् की गहराई तक पहुँचने के लिए संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य है। आज के आधुनिक संदर्भ में भी प्रतिष्ठित आयुर्वेद संस्थानों द्वारा संस्कृत के महत्व को मान्यता दी जा रही है।
अतः यह स्पष्ट होता है कि आयुर्वेद की आत्मा को समझने और संरक्षित रखने के लिए संस्कृत भाषा का ज्ञान नितांत आवश्यक है।
Keywords संस्कृत भाषा, आयुर्वेदिक ग्रंथ, व्याकरणिक शुद्धता, दार्शनिक आधार, ज्ञान-संरक्षण
Field Medical / Pharmacy
Published In Volume 7, Issue 6, November-December 2025
Published On 2025-11-22
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i06.57124

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