International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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कमार जनजाति के विविध संस्कार

Author(s) उमेश कुमार पटेल, डाॅ. अजय कुमार सिंह
Country India
Abstract कमार जनजाति भारत की अनुसूचित जनजातियों मे से एक हैं। कम होती जनसंख्या, न्यून साक्षरता दर, कृषि की आदिम तकनीक एवं आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर कमार जनजाति को विशेष पिछड़ी जनजाति घोषित किया गया है। कमार जनजाति के लोग अपनी उत्पति देवडोंगर से मानते है। उनका सबसे बड़ा देवता आज भी देवडोंग के ’’वामन डोंगरी’’ मे स्थापित है। कमार जनजाति आत्मावादी हैं। कमार जनजाति आपसी संवाद हेतु कमारी बोली तथा स्थानीय रूप से छत्तीसगढ़ी भाषा का उपयोग करते हैं। कमार जनजाति बुन्दरजीवा एवं पहाड़िया दो उपजाति मेें विभक्त है। कमार जनजाति एक बहिविर्वाही समुदाय है। इनमें एक ही गोत्र में विवाह संबंध निषेध है। कमार जनजाति का मुख्य व्यवसाय बांस से सुपा, टोकरी, झांपी एवं पर्रा आदि बनाना है। पक्षियों का शिकार करना और छोटे जानवरों का शिकार करना इनके जिविकोपार्जन का साधन है। कमार जनजाति पितृसत्तात्मक समुदाय है। आर्थिक क्षेत्र में निर्णय लेने में महिलाएं स्वतंत्र है। इनके सामाजिक संगठन में समाज या जाति का स्थान महत्वपूर्ण होता है। सामजिक नियमों का पालन निर्धारित करने व उन पर निर्णय लेने हेतु कमार लोंगो की विशिष्ट निर्भरता होती है। कमार जनजाति में विवाह योग्य व्यस्क होने के बाद माना जाता है। इसमे विवाह प्रस्ताव लड़के पक्ष द्वारा रखा जाता है। विवाह तय होने पर ’’सुकधन’’ (वधुमूल्य) दिया जाता है। इनमे विवाह समान्यतः तीन दिन का होता है। विधवा पुनर्विवाह मान्य है। कमार जनजाति द्वारा मृतक को दफनाया जाता है। पांचवे या तेरहवें दिन मृत्यु भोज दिया जाता है। कमार जाति के लोंग आपसी विवाद का निपटारा पंचायत के माध्यम से करते है। कमार जनजाति की महिलाएं विवाह पूर्व या छोटी उम्र में गोदना गुदवाती है। स्त्रियां इसे अपना स्थायी आभूषण मानती है। गोदना गोदने का कार्य देवार जाति द्वारा किया जाता है।
Keywords देवी-देवता, बोमला, नार फूल, धरम पानी, नवा खाई, डूमा माटी
Published In Volume 7, Issue 6, November-December 2025
Published On 2025-11-07
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i06.60221

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