International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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स्वतंत्रता पूर्व कथा साहित्य में - वृद्धावस्था

Author(s) डाॅ. स्नेहलता निर्मलकर
Country India
Abstract सन् 1980 के बाद से लेकर 21 वीं शताब्दी के हाल के वर्षों में हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श, किन्नर विमर्श, वृद्ध विमर्श, पुरुष विमर्श, विकलांग विमर्श आदि समूहों के अस्तित्व व अधिकारों को लेकर साहित्यकार अपनी विचारधारा पक्ष-विपक्ष के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। मानवीय मौलिक अधिकारों हेतु साहित्य वर्ग हमेशा सजग और संवेदनशील रहता है। भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से अनेक समस्याएँ समाज को प्रभावित कर रही हैं। समाज का हर इंसान अनेक समस्याओं से ग्रस्त है। साहित्य में सामाजिक समस्याओं को प्राथमिकता दी जाती है। भारत में सामाजिक संरचना को भारतीय संस्कृति का विशेष अंग माना गया है। सामाजिक संरचना में समाज व परिवार दोनों को मान्यता प्राप्त है। परिवार का मुखिया घर में उपस्थित बुजुर्ग को ही माना जाता है। इस कारण जब भी कोई लेखक या रचनाकार अपने कथानक को कहानी या उपन्यास का रूप देने का प्रयास करता है तब घर का मुखिया वृद्ध ही होता है। वर्तमान समय की रचनाओं में वृद्धावस्था की समस्याओं का चित्रण देखने को मिलता है। वर्तमान समय में एकल परिवारों का महत्व बढ़ गया है। संयुक्त परिवारों का विघटन वृद्धों की मुख्य समस्या है। वर्तमान गद्य साहित्य में वृद्धों की इस समस्या का चित्रण प्रमुखतः होता है। साहित्य में वृद्धावस्था का चित्रण सामाजिक परिवेश में प्राचीन समय से मिलता हैं। प्राचीन समय की साहित्यिक सामग्री में वृद्धों के मान सम्मान पर अनेक प्रकार की चैपाई, श्लोक, दोहे और लोकोक्ति, मुहावरे प्राप्त होते हैं, जिनका प्रचलन वर्तमान समय में सामान्य रूप में होता है।
Keywords विमर्श , संस्कृति, साहित्य, जीवनशैली, समस्या
Published In Volume 7, Issue 6, November-December 2025
Published On 2025-12-14
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i06.63275

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