International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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स्वतंत्रता के पश्चात दलित विमर्श की दशा और दिशा

Author(s) Mr. Sohan Singh
Country India
Abstract भारतीय समाज का इतिहास सामाजिक वर्गीकरण, जाति-व्यवस्था और असमानता से गहराई से जुड़ा हुआ है। दलित समुदाय, जिसे ऐतिहासिक रूप से 'अछूत', 'अस्पृश्य' या 'पिछड़ा वर्ग' कहा गया, ने सदियों से सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक क्षेत्रों में चरम स्तर का शोषण एवं बहिष्कार झेला है। 1947 में भारत की स्वतंत्रता नेकेवल औपनिवेशिक शासन से मुक्ति दिलाई, बल्कि घोषणा की कि अब यह राष्ट्र समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित होगा। संविधान के माध्यम से दलितों को नागरिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय का वादा किया गया। किंतु, क्या वास्तव में स्वतंत्रता के बाद दलित जनसमूह की सामाजिक स्थिति में मूलभूत परिवर्तन आया? क्या दलित विमर्श- अर्थात् दलित समुदाय द्वारा अपने अस्तित्व, अधिकार एवं पहचान के संदर्भ में रचित विचारधारा, साहित्य, राजनीति और सांस्कृतिक अभिव्यत्तिः स्वतंत्र भारत में एक सशक्त एवं स्वतंत्र धारा के रूप में उभर पाया? यही प्रश्न इस शोध के मूल में है।
Keywords दलित, विमर्श, समानता,सामाजिक न्याय
Field Sociology
Published In Volume 7, Issue 6, November-December 2025
Published On 2025-12-26
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2025.v07i06.64500

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