International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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समकालीन लेखिकाओं के उपन्यासों में नारीवादी दृष्टि

Author(s) MS SHIVALI MEHTA, DR. RAJBALA RAJBALA
Country India
Abstract साहित्य और समाज का घनिष्ठ संबंध है। साहित्यकार अपने युग परिवेश से प्रभावित होते हुए अपने साहित्य की रचना करता है। समकालीन लेखिकाओं ने नारीवादी दृष्टि अपनाते हुए अपने साहित्य के माध्यम से स्त्री जीवन के संघर्षों को वाणी प्रदान की। नारीवादी विचारधारा स्त्री पुरुष समानता की पक्षधर है। इसका मूल उद्देश्य स्त्री की मानवीय गरिमा को स्थापित करते हुए उस सामाजिक संरचना का विरोध करना है जिसमें स्त्री को हाशिए पर रखा गया। नारीवादी साहित्य के अंतर्गत स्त्री और पुरुष के बीच व्याप्त असमानता का विरोध करते हुए लैंगिक समता पर बल दिया जाता है। समकालीन लेखिकाओं जैसे प्रभा खेतान, उषा प्रियंवदा, ममता कालिया, चित्रा मुद्गल, मधु कांकरिया, मैत्रेयी पुष्पा, नासिरा शर्मा आदि ने अपने उपन्यासों के माध्यम से स्त्री जीवन के विविध पक्षों को उद्घाटित करते हुए उनके संघर्षों, पीड़ा, मानसिक द्वंद्व, शोषण और उत्पीड़न को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है।
Keywords नारीवाद, संघर्ष, उत्पीड़न, मानसिक द्वंद्व, लैंगिक समानता, सशक्तिकरण।
Field Sociology > Linguistic / Literature
Published In Volume 8, Issue 2, March-April 2026
Published On 2026-03-23
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i02.72234

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