International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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वर्तमान शिक्षा प्रणाली में अस्तित्ववाद की प्रासंगिकता का अध्ययन

Author(s) Pratibha Solanki, Dr. Farah Mehar
Country India
Abstract अस्तित्ववाद समकालीन युग का एक महत्वपूर्ण और लोकप्रिय दर्शन है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह “अस्तित्व” यानी मनुष्य के होने और उसके जीवन के अर्थ की विवेचना करता है। इस दर्शन के अनुसार मनुष्य एक सांसारिक और सामाजिक प्राणी है, जिसका जीवन सीमित है, लेकिन वह पूर्णतः स्वतंत्र है और अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है। अस्तित्ववाद मनुष्य के वास्तविक स्वरूप, उसकी स्वतंत्रता, जिम्मेदारी और चुनावों पर गहन चिंतन करता है। इसलिए इसे मानववादी दर्शन भी कहा जाता है।
यह कहना भी सही है कि अस्तित्ववाद बिल्कुल नया दर्शन नहीं है। इसके बीज प्राचीन और मध्यकालीन चिंतकों में भी मिलते हैं, जैसे सुकरात, संत ऑगस्टाइन और ब्लेज़ पास्कल। इन विचारकों ने मनुष्य के आंतरिक अनुभव, नैतिकता और अस्तित्व से जुड़े प्रश्नों पर विचार किया, जो आगे चलकर अस्तित्ववाद के विकास में सहायक बने।
आधुनिक अस्तित्ववाद के प्रमुख दार्शनिक ज्याँ-पॉल सार्त्र के अनुसार, “अस्तित्व सार से पहले आता है” (Existence precedes essence)। इसका अर्थ है कि मनुष्य पहले अस्तित्व में आता है और फिर अपने कर्मों और चुनावों से अपना स्वरूप (essence) स्वयं बनाता है। इस सिद्धांत के अनुसार मानव जीवन में आत्मनिष्ठा (subjectivity) और बाहरी परिस्थितियाँ (environment) दोनों की भूमिका होती है।
Keywords दार्शनिक विचार, व्यक्तित्व निर्माण, नैतिकता, आत्मनिष्ठा, मानववादी दर्शन, स्वतंत्रता, अस्तित्ववाद, भाग्य का निर्माता
Published In Volume 8, Issue 2, March-April 2026
Published On 2026-03-29
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i02.72792

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