International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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वर्तमान में वेदांत दर्शन की प्रासंगिकता

Author(s) डॉ. लक्ष्मीकान्त नेमा
Country India
Abstract विश्व की ज्ञान परम्परा में भारतीय दर्शन को सबसे प्राचीन और समृद्ध दार्शनिक परम्परा माना जाता है। प्राचीन काल से ही भारत में मनुष्य के जीवन, जगत और परम सत्य के बारे में गहराई से चिंतन किया जाता रहा है। इसी दार्शनिक परंपरा में वेदांत दर्शन का विशेष और महत्वपूर्ण स्थान है। वेदांत दर्शन मुख्य रूप से उपनिषदों में बताए गए आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित है। इसमें यह बताया गया है कि ब्रह्म (परम सत्य) और आत्मा मूल रूप से एक ही हैं, और मनुष्य सही ज्ञान प्राप्त करके इस सत्य को समझ सकता है। वेदांत दर्शन केवल दार्शनिक चिंतन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य के जीवन को सही दिशा देने का भी कार्य करता है। यह मनुष्य को आत्मचिंतन, संयम, सत्य, करुणा और नैतिकता जैसे मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देता है। इसके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन के वास्तविक उद्देश्य को समझने का प्रयास करता है और आंतरिक शांति प्राप्त कर सकता है। वर्तमान समय में समाज कई प्रकार की समस्याओं से घिरा हुआ है। आज भौतिकवाद का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया है, जिसके कारण लोग बाहरी सुख-सुविधाओं के पीछे अधिक भाग रहे हैं और आंतरिक शांति से दूर होते जा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप मानसिक तनाव, असंतोष, प्रतिस्पर्धा, नैतिक मूल्यों का पतन, पर्यावरण संकट तथा सामाजिक असमानता जैसी समस्याएँ बढ़ती जा रही हैं। ऐसी परिस्थितियों में वेदांत दर्शन के सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रासंगिक दिखते हैं। यह दर्शन मानव को समन्वय, सहअस्तित्व और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना विकसित करने की प्रेरणा देता है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य वेदांत दर्शन की मूल अवधारणाओं का अध्ययन करना तथा यह समझना है कि आधुनिक समाज में इसकी प्रासंगिकता किस प्रकार बनी हुई है। साथ ही यह भी जानने का प्रयास किया जाएगा कि वेदांत दर्शन के सिद्धांत आज के समाज को मानसिक शांति, नैतिक दिशा और संतुलित जीवन की ओर कैसे मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं।
Keywords वेदांत, प्रस्थानत्रयी. ब्रह्म, आत्मा, अद्वैत, आध्यात्मिकता, नैतिकता।
Field Arts
Published In Volume 8, Issue 2, March-April 2026
Published On 2026-04-01

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