International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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मानव जीवन में संगीतः भाव लय और अभिव्यक्ति का समन्वय

Author(s) Dr. Tekeshwar Bisen, Dr. Santosh Namdev
Country India
Abstract सामान्यतः यह माना जाता है कि संगीत का अस्तित्व मनुष्य के जन्म से पूर्व ही था। प्रकृति में उत्पन्न ध्वनियाँ- जैसे पक्षियों का कलरव जल की कलकल ध्वनि तथा वायु की सनसनाहट-संगीत के आदिम रूप मानी जा सकती हैं। मनुष्य ने धीरे-धीरे इन ध्वनियों को पहचान, उनमें सौंदर्य का अनुभव किया और उनसे रुचि विकसित की । यही कारण है कि आज हम इन प्राकृतिक ध्वनियों को संगीत की प्रारंभिक अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार करते हैं। संगीत की मनोहारी शक्ति को अनुभव करते हुए, मनुष्य ने इसे ईश्वर से संवाद का माध्यम बनाया। कालांतर में संगीत मानव जीवन में भावनाओं की अभिव्यक्ति का एक सशक्त साधन बन गया- चाहे वह प्रसन्नता हो, दुःख हो, आशा, प्रेम या क्रोध । दैनिक जीवन में भी संगीतात्मक लय का विशेष महत्व है। उदाहरणार्थ जब एक माँ अपने शिशु को सुलाती है तो वह सहज रूप से लोरी गुनगुनाती है, जिससे बच्चे को सुकून और स्नेह का अनुभव होता है। माँ की लोरी केवल शब्दों का संयोजन नहीं होती, बल्कि वह एक मधुर लयात्मक अभिव्यक्ति होती है| जिसे शिशु सहज ही महसूस और समझ लेता है। इस प्रकार संगीतात्मक लय के माध्यम से एक गहरा भावनात्मक संबंध स्थापित होता है। प्रस्तुत शोध-पत्र के माध्यम से मानव जीवन में संगीत के महत्व को रेखांकित करने का एक सार्थक प्रयास किया गया है।
Keywords भावनात्मक ,ध्वनि ,हृदय, धड़कन ,लयात्मक, शरीर, मन, प्राण |
Field Arts > Movies / Music / TV
Published In Volume 8, Issue 2, March-April 2026
Published On 2026-04-14
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i02.74606

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