International Journal For Multidisciplinary Research
E-ISSN: 2582-2160
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Volume 8 Issue 3
May-June 2026
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जलवायु परिवर्तन का फसल विविधीकरण पर प्रभाव
| Author(s) | मनमोहन मीना |
|---|---|
| Country | India |
| Abstract | जलवायु परिवर्तन भारतीय कृषि को गंभीर चुनौतियों से घेर रहा है, जिसमें बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और चरम मौसम घटनाएँ शामिल हैं। इनसे पारंपरिक मोनोकल्चर प्रणालियाँ (जैसे धान-गेहूँ) अस्थिर हो रही हैं, जिससे उपज में 10-40% तक कमी आ सकती है। फसल विविधीकरण को जलवायु अनुकूलन की प्रमुख रणनीति माना जा रहा है, जो जोखिम न्यूनीकरण, मिट्टी स्वास्थ्य सुधार, जल दक्षता और आय स्थिरता प्रदान करता है। सरकारी योजनाएँ जैसे राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA), फसल विविधीकरण कार्यक्रम (CDP), प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM) जल-कुशल, सूखा-सहिष्णु फसलों (मोटे अनाज, दलहन, तिलहन, बागवानी) को बढ़ावा दे रही हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि विविधीकरण से जलवायु जोखिम 25-45% तक कम हो सकता है, मिट्टी का कार्बनिक पदार्थ बढ़ सकता है और उपज स्थिरता आ सकती है। फिर भी, MSP की विकृति, बाजार पहुंच की कमी और छोटे किसानों की सीमित क्षमता चुनौतियाँ हैं। यह शोध पत्र जलवायु परिवर्तन के प्रभावों, फसल प्रतिरूप परिवर्तनों, विविधीकरण की भूमिका, राज्य-स्तरीय उदाहरणों, नीतिगत हस्तक्षेपों, चार्ट/टेबलों के साथ विश्लेषण और सिफारिशों का विस्तृत परीक्षण करता है। डेटा IPCC, ICAR, आर्थिक सर्वेक्षण, PIB और हाल के शोध पत्रों पर आधारित है। मुख्य शब्द : मोनोकल्चर ,जलवायु ,विविधिकरण ,फसल प्रतिरूप ,तिलहन I परिचय : भारत विश्व की सबसे बड़ी वर्षा-आधारित कृषि अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, जहाँ कृषि GDP का लगभग 18% योगदान देती है और 45-50% जनसंख्या को रोजगार प्रदान करती है। जलवायु परिवर्तन इस क्षेत्र को सबसे अधिक प्रभावित कर रहा है। IPCC रिपोर्ट्स और भारतीय अध्ययनों के अनुसार, 1.5-2°C तापमान वृद्धि से अनाज फसलों की उपज में 10-40% कमी आ सकती है। गेहूँ की उपज 2050 तक 19.3% और 2080 तक 40% तक घट सकती है, जबकि धान, मक्का और अन्य फसलों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। अनियमित मानसून, बढ़ते सूखे/बाढ़ और चरम तापमान फसल चक्र बाधित कर रहे हैं। फसल विविधीकरण इन चुनौतियों का प्रभावी समाधान है। यह मोनोकल्चर से हटकर जल-कुशल, सूखा-सहिष्णु और पोषक फसलों (श्री अन्न/मोटे अनाज, दलहन, तिलहन, फल-सब्जियाँ) की ओर संक्रमण है। विविधीकरण क्षैतिज (क्षेत्र विस्तार), लंबवत (मूल्य संवर्धन) और एकीकृत (crop-livestock-agroforestry) रूपों में होता है। यह न केवल जलवायु लचीलापन बढ़ाता है बल्कि मिट्टी की उर्वरता बहाल करता है, जैव विविधता संरक्षित करता है और किसानों की आय स्थिर बनाता है। यह पत्र जलवायु परिवर्तन के फसल विविधीकरण पर प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष प्रभावों का विश्लेषण करता है, जिसमें चार्ट और टेबलों के माध्यम से फसल प्रतिरूप परिवर्तन, अनुकूलन रणनीतियाँ और सरकारी नीतियाँ शामिल हैं। विश्लेषण द्वितीयक डेटा (ICAR, DST, PIB, शोध पत्र 2023-2026) पर आधारित है। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में विविधीकरण भारत की खाद्य सुरक्षा और किसान आय दोगुनी करने के लक्ष्य को मजबूत कर सकता है। साहित्य समीक्षा (Literature Review) जलवायु परिवर्तन और फसल विविधीकरण पर व्यापक शोध उपलब्ध है। Birthal et al. (2021) के अनुसार, RCP4.5 परिदृश्य में तापमान वृद्धि से फसल उपज 2041-2060 में 1.8-6.6% और 2061-2080 में 7.2-23.6% कम हो सकती है। Paria et al. (2022) ने पश्चिम बंगाल के जिला-स्तरीय डेटा से पाया कि सापेक्ष आर्द्रता और तापमान भिन्नता फसल प्रतिरूप को गैर-अनाज फसलों की ओर मोड़ती है। Kumari et al. (2025) ने जोर दिया कि विविधीकरण फसल विफलता का जोखिम कम करता है और लचीलापन बढ़ाता है। Sridhar et al. (2025) ने हरियाणा और ओडिशा के उदाहरणों से दिखाया कि विविधीकरण से बाजार पहुंच और आय में सुधार होता है। Das et al. (2025) की समीक्षा में जलवायु परिवर्तन से खाद्य सुरक्षा के सभी आयामों पर नकारात्मक प्रभाव उजागर हुआ, जिसमें उपज ह्रास (धान 10-40%, गेहूँ 2-10%) शामिल है। Gallé (2025) ने तापमान और वर्षा विसंगतियों के प्रतिस्पर्धी प्रभाव का विश्लेषण किया, जिसमें धान उपज पर नकारात्मक प्रभाव प्रमुख है। Kumar et al. (2026) ने दक्षिण एशिया में विविधीकरण से मिट्टी स्वास्थ्य, उत्सर्जन कमी और ऊर्जा दक्षता पर सकारात्मक ट्रेड-ऑफ दिखाए। Mihrete (2025) ने विविधीकरण से जलवायु परिवर्तन के तहत उपज 15% तक बढ़ने की संभावना बताई। ICAR और DST रिपोर्ट्स (2016-2026) में जलवायु-लचीली किस्में और विविधीकरण को अनुकूलन के रूप में प्रमोट किया गया है। IPCC SRCCL (2019) और AR6 भी विविधीकरण को food system resilience के लिए key strategy मानते हैं। साहित्य सकारात्मक प्रभाव (उपज स्थिरता, जोखिम कम) के साथ चुनौतियाँ (नीतिगत विकृति, बाजार पहुंच) को स्वीकार करता है। (शब्द संख्या: ≈ 520; कुल ≈ 1220) जलवायु परिवर्तन के फसल विविधीकरण पर प्रभाव: सैद्धांतिक और व्यावहारिक ढांचा (Theoretical and Practical Framework) जलवायु परिवर्तन फसल विविधीकरण को दो तरीकों से प्रभावित करता है: नकारात्मक दबाव (मोनोकल्चर को अस्थिर बनाकर विविधीकरण की आवश्यकता बढ़ाना) और अनुकूलन अवसर (विविध फसल पोर्टफोलियो से लचीलापन)। सैद्धांतिक रूप से, यह portfolio theory और comparative advantage पर आधारित है। प्रत्यक्ष प्रभाव: उपज ह्रास और चक्र बाधा: बढ़ता तापमान फसल वृद्धि अवधि छोटी करता है। जल और मिट्टी प्रभाव: अनियमित वर्षा से सूखा/बाढ़ बढ़ता है, जिससे जल-गहन फसलों का क्षेत्र घटता है। कीट-रोग वृद्धि: उच्च तापमान कीट प्रसार बढ़ाता है, जो intercropping से नियंत्रित होता है। अप्रत्यक्ष प्रभाव: आर्थिक (MSP विकृति), सामाजिक (छोटे किसानों पर असमान प्रभाव)।व्यावहारिक रूप में, पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे राज्यों में किसान धान से दलहन/मक्का की ओर बढ़ रहे हैं। Simpson Diversity Index से मापा जाए तो विविध क्षेत्र अधिक प्रभाव दिखता है I |
| Keywords | . |
| Field | Arts |
| Published In | Volume 6, Issue 2, March-April 2024 |
| Published On | 2024-04-05 |
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