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E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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मुक्तिबोध की लंबी कविताओं में वर्तमान सामाजिक यथार्थ और विद्रोह

Author(s) डॉ. प्रेमचंद
Country India
Abstract गजानन माधव मुक्तिबोध आधुनिक हिंदी कविता के ऐसे विलक्षण कवि हैं जिनकी काव्य-दृष्टि ने भारतीय समाज की अंतर्विरोधी संरचना, मध्यवर्गीय चेतना की विडंबनाओं, सत्ता-संरचना के अमानवीय चरित्र, बौद्धिक वर्ग की नैतिक पराजय और जन-जीवन के संघर्षशील यथार्थ को अभूतपूर्व तीव्रता के साथ अभिव्यक्त किया। उनकी लंबी कविताएँ—विशेषतः ‘अँधेरे में’, ‘ब्रह्मराक्षस’, ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’, ‘भूरी-भूरी खाक धूल’, ‘एक अन्तर्कथा’ और अन्य लंबी संरचनात्मक कविताएँ—भारतीय आधुनिकता के उस संकट को उद्घाटित करती हैं जिसमें सामाजिक विषमता, राजनीतिक पाखंड, सांस्कृतिक विघटन, मानसिक विभाजन और ऐतिहासिक असुरक्षा एक साथ उपस्थित हैं। यह शोध-पत्र मुक्तिबोध की लंबी कविताओं में निहित सामाजिक यथार्थ और विद्रोह की संवेदना का अध्ययन वर्तमान भारतीय संदर्भ में करता है। शोध का केंद्रीय प्रतिपाद्य यह है कि मुक्तिबोध का यथार्थ केवल उनके समय का समाजशास्त्रीय दस्तावेज नहीं, बल्कि समकालीन भारत की वर्गीय, सांस्कृतिक और वैचारिक जटिलताओं को समझने का एक सशक्त आलोचनात्मक उपकरण भी है। उनकी कविता में विद्रोह मात्र नारेबाजी या भावुक आवेग नहीं है; वह आत्मालोचना, वर्ग-चेतना, नैतिक साहस और जनपक्षधरता से निर्मित एक वैचारिक-एस्थेटिक ऊर्जा है। अध्ययन में पाठ-विश्लेषण, मार्क्सवादी आलोचना, आधुनिकतावादी विमर्श, उत्तर-औपनिवेशिक परिप्रेक्ष्य तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों की सहायता ली गई है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मुक्तिबोध की लंबी कविताएँ वर्तमान समय में भी सामाजिक न्याय, बौद्धिक ईमानदारी और जन-आधारित प्रतिरोध की सबसे विश्वसनीय काव्य-आवाजों में शामिल हैं।
Keywords मुक्तिबोध, लंबी कविता, सामाजिक यथार्थ, विद्रोह, आधुनिकता, मध्यवर्ग, जनचेतना, अँधेरे में, ब्रह्मराक्षस, हिंदी कविता
Published In Volume 8, Issue 3, May-June 2026
Published On 2026-05-11
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i03.78244

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