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E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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हरिश राणा बनाम भारत संघ: इच्छा मृत्यु पर सर्वाेच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय का विश्लेषणात्मक अध्ययन

Author(s) Prof. Dr. अशोक कुमार सोनकर, Mr. दीपक
Country India
Abstract हरिश राणा बनाम भारत संघ का मामला भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु और मानव गरिमा के अधिकार से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील निर्णय है। यह मामला एक ऐसे व्यक्ति से संबंधित है जो लगभग तेरह वर्षों से स्थायी अचेत अवस्था में जीवन व्यतीत कर रहा था। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि क्या केवल कृत्रिम जीवन-रक्षक साधनों के माध्यम से जीवन को बनाए रखना उचित है या नहीं ? सर्वाेच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जीवन का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत केवल जीवित रहने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गरिमापूर्ण जीवन और गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार भी शामिल है। न्यायालय ने वर्ष 2018 के कॉमन कॉज मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार अब संवैधानिक अधिकार का हिस्सा है। साथ ही अरुणा शानबाग मामले के सिद्धांतों को भी आधार बनाया गया। जिसमें पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सीमित परिस्थितियों में मान्यता दी गई थी। न्यायालय ने यह भी माना कि चिकित्सा पोषण सम्बन्धी प्रक्रियाएँ भी चिकित्सकीय उपचार हैं। जिन्हें परिस्थितियों के अनुसार रोका जा सकता है। निर्णय का मुख्य आधार “रोगी के सर्वाेत्तम हित” का सिद्धांत रहा। जिसमें रोगी की शारीरिक स्थिति, मानसिक पीड़ा, जीवन की गुणवत्ता और सुधार की संभावना का समग्र मूल्यांकन किया गया। दो स्तरीय चिकित्सा समिति की रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि रोगी के ठीक होने की संभावना नगण्य है। अतः उपचार केवल उसकी स्थिति को लंबा कर रहा है। अंततः न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि उपचार रोकने का निर्णय केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह करुणा, संवेदना और मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित होना चाहिए। यह निर्णय भारत में इच्छा मृत्यु और मानव गरिमा की संवैधानिक व्याख्या को एक नई दिशा प्रदान करता है।
Keywords इच्छा मृत्यु, गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार, अनुच्छेद 21, सर्वाेच्च न्यायालय।
Published In Volume 8, Issue 3, May-June 2026
Published On 2026-05-15

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