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E-ISSN: 2582-2160   •   Impact Factor: 9.24

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श्रीमद्भगवद्गीता के आलोक में कर्तव्यविचलित अंतःकरण में ज्ञान-कर्म समन्वय और चेतना का पुनर्जागरण

Author(s) Prof. Pawan Kumar Gupta
Country India
Abstract प्रस्तुत आलेख "श्रीमद्भगवद्गीता के आलोक में कर्तव्यविचलित अंतःकरण में ज्ञान-कर्म समन्वय और चेतना का पुनर्जागरण" मानव जीवन में आने वाले मानसिक अवसाद, कर्तव्य-विमुखता और आधुनिक 'एग्जिस्टेंशियल क्राइसिस' (अस्तित्व के संकट) का श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत करता है। लेख स्पष्ट करता है कि अर्जुन का विषाद किसी कायरता का परिणाम नहीं, बल्कि मोह और आसक्ति के कारण उत्पन्न हुआ कर्तव्य-संकट है, जो प्रत्येक युग के उस मनुष्य का प्रतीक है जो अपने संकीर्ण स्वार्थों के कारण व्यापक सामाजिक उत्तरदायित्वों से भटक जाता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण आत्मा की शाश्वतता और शरीर की नश्वरता का ज्ञान देकर अर्जुन को मृत्यु, भय और शोक से मुक्त करते हैं, जिससे उसे आन्तरिक स्थिरता प्राप्त होती है। इसके साथ ही, आलेख गीता के 'निष्काम कर्म' सिद्धांत पर गहराई से विचार करता है, जो कर्म से पलायन नहीं बल्कि फल की आसक्ति से मुक्ति है। स्वधर्म का पालन व्यक्तिगत सुख से ऊपर उठकर सामाजिक और नैतिक उत्तरदायित्व निभाने का नाम है। सफलता-विफलता और सुख-दुःख में समान भाव (समत्व) रखना ही सच्चा 'योग' है और एक 'स्थितप्रज्ञ' व्यक्ति समस्त भौतिक आकर्षणों से मुक्त होकर, कीचड़ में कमल की भाँति निर्लिप्त रहते हुए कुशलतापूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्वाह करता है। अंततः, यह स्पष्ट किया गया है कि आज के भौतिकवादी, प्रतिस्पर्धी और तनावपूर्ण युग में, गीता का यह 'ज्ञान-कर्म समन्वय' भटके हुए और अवसादग्रस्त मनुष्य को पुनः पुरुषार्थ और सक्रियता के मार्ग पर लाने के लिए समग्र मानवता की चेतना का एक शाश्वत महाघोष है।
Keywords ​ज्ञान-कर्म समन्वय, ​निष्काम कर्म, ​कर्तव्यच्युति / कर्तव्य-विमुखता, ​स्थितप्रज्ञ, ​समत्व योग, ​आत्मबोध, ​चेतना का पुनर्जागरण, ​मानसिक अवसाद / विषाद, ​पुरुषार्थ, ​भारतीय दर्शन, श्रीमद्भगवद्गीता
Field Arts
Published In Volume 8, Issue 4, July-August 2026
Published On 2026-07-09
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i04.83396

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