International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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पातंजल योगसूत्र में समाधि की अवधारणा: एक अध्ययन

Author(s) Mr. Aadarsh Shrivas
Country India
Abstract शोध सार:
मनुष्य जीवन के रहस्यों को उजागर करना और पुरुषार्थ चतुष्टय अर्थात धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की प्राप्ति के लिए भारतीय दर्शन की अविरल धारा में प्रवाहित योग विद्या से जुड़ना अनिवार्य है, जो मानव के सर्वांगीण विकास का माध्यम बनती है। इसी योग परम्परा में महर्षि पतंजलि ने अपने पातंजल योगसूत्र के माध्यम से विभिन्न स्तर के साधकों को विशिष्ट मार्गदर्शन प्रदान किया तथा अष्टांग योग के अंतर्गत समाधि को मानव जीवन के परम लक्ष्य के रूप में प्रतिपादित किया, जो चित्तवृत्तियों के सर्वथा निरोध की वह अवस्था है जिसमें ध्येय मात्र का स्वरूप शून्यवत भासित होता है। प्रस्तुत शोध पत्र में समाधि के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए इसके दो प्रमुख भेदों - सम्प्रज्ञात समाधि तथा असम्प्रज्ञात समाधि - का विस्तृत विवेचन किया गया है, साथ ही इनके अंतर्गत आने वाले विभिन्न प्रकारों (जैसे वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनन्दानुगत, अस्मितानुगत) को भी स्पष्ट किया गया है। इसके अतिरिक्त शोध में ऋतंभरा प्रज्ञा की अवधारणा का विश्लेषण किया गया है, जो समाधि की उच्चतर अवस्था में उत्पन्न होने वाली विशिष्ट, सत्य-धारण करने वाली प्रज्ञा है और सामान्य श्रुति-अनुमान जनित ज्ञान से भिन्न, यथार्थ का प्रत्यक्ष बोध कराती है। अंततः शोध में निर्बीज समाधि की अवस्था को भी स्पष्ट किया गया है, जो समाधि की सर्वोच्च एवं अंतिम अवस्था मानी जाती है, जिसमें समस्त संस्कार-बीज भी नष्ट हो जाते हैं और चित्त पूर्णतः वृत्तिशून्य होकर कैवल्य की ओर अग्रसर होता है। इस प्रकार यह अध्ययन समाधि के सैद्धांतिक स्वरूप से लेकर सबीज अवस्थाओं से होते हुए निर्बीज समाधि तक की सम्पूर्ण साधना-यात्रा को समग्रता से प्रस्तुत करता है, जो साधकों को समाधि के वास्तविक स्वरूप को समझने और आध्यात्मिक उन्नति के पथ पर अग्रसर होने में सहायक सिद्ध होगा।
Keywords कूट शब्द: समाधि, अष्टांग योग, ऋतम्भरा प्रज्ञा, चित्त वृत्ती
Field Sociology > Philosophy / Psychology / Religion
Published In Volume 8, Issue 4, July-August 2026
Published On 2026-07-18
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i04.83951

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