International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

A Widely Indexed Open Access Peer Reviewed Multidisciplinary Bi-monthly Scholarly International Journal

Call for Paper Volume 8, Issue 4 (July-August 2026) Submit your research before last 3 days of August to publish your research paper in the issue of July-August.

गुप्तकालीन मंदिर वास्तु में गंगा-यमुना का अंकन

Author(s) Dr. Rashmi Jharia
Country India
Abstract भारतीय कला धर्म से अनुप्राणित है । वैदिक युग से ही कला के समस्त पक्षों में धार्मिक भावनाओं का समावेश हुआ है । गुप्तकाल धर्म के पुनरुत्थान और समन्वय में विशेष महत्व रखता है । यहीं से मूर्तिकला अपने कलात्मक स्वरूप के विभिन्न चरणों से गुजरते हुए लावण्यता,माधुर्यता तथा शालीनता को अपने में समेटे हुए परिपूर्ण और परिष्कृत हो गई ।
गुप्तकालीन मंदिर वास्तुकला भारतीय कला इतिहास का एक महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें मंदिर निर्माण की परिपक्व परंपरा विकसित हुई। तत्कालीन भारत की दो पुण्यासलिलाओं गंगा और यमुना का गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर मानव रूप में अंकन विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यह अंकन केवल सजावटी नहीं था, बल्कि धार्मिक प्रतीकात्मकता से जुड़ा था। गंगा और यमुना भारतीय संस्कृति में जीवनदायिनी और शुद्धिकरण की शक्ति का प्रतीक हैं। मंदिर के द्वार पर इनका अंकन इस विचार को पुष्ट करता है कि गर्भगृह में प्रवेश करने वाला भक्त पहले पवित्रता और शुद्धता से युक्त हो। उल्लेखनीय है कि मंदिर का द्वार एक तीर्थ के रूप में देखा जाता था, जहाँ से गुजरना नदी स्नान के समान शुद्धिकरण का अनुभव देता है।
मकरवाहिनी गंगा और कूर्मवाहिनी यमुना ये दोनों नदी देवियों का त्रिभंग मुद्रा में, हाथ में कलश और सहचर स्त्रियों के साथ गुप्तकालीन मंदिरों जैसे दशावतार मंदिर, देवगढ़, भूमरा शिव मंदिर और तिगवां विष्णु मंदिर में अंकन गुप्तकाल में इन दोनों नदियों के महत्व को इंगित करता है ।
Keywords वास्तुकला, परिपक्व, गर्भगृह, मकर, कूर्म, त्रिभंग मुद्रा, सहचर, प्रतीकात्मकता, जीवनदायिनी, शुद्धिकरण, दशावतार,समन्वय
Published In Volume 8, Issue 4, July-August 2026
Published On 2026-08-01

Share this