International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

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मन्दिर वास्तु : उत्कर्ष- प्रकर्ष एवं प्रतीकत्व

Author(s) Sangram Singh, Dr. Shivakant Tripathi
Country India
Abstract ब्राह्मण ग्रंथों में ब्रह्माण्ड में व्याप्त मूलतत्व की अनन्तता से अनुप्राणित होकर वैदिक ऋषियों ने ‘अनन्त वै वेदाः’ कहकर वैदिक चिन्तन के सुविस्तीर्ण क्षेत्र का परिचय दिया है। अनन्त सत्ता को नाना रूपों और प्रतीकों द्वारा अभिव्यक्त करने का प्रयत्न वैदिक चिन्तन की विशेषता है। ऋग्वेदोक्त सहस्रशीर्षा पुरुष ही वह अनन्त सत्ता है। उसकी अन्य संज्ञा ‘ऊर्ध्व’ और ‘त्रिपाद’ है जो सृष्टि से ऊपर अथवा बाहर रहते हुए भी सृष्टि से भी अविच्छिन्न रहता है (त्रिपाद उर्ध्वमदैपुरूषः पादोऽस्येहाभवत्पुन:)। सृष्टि में सर्वत्र चैतन्य की सत्ता विराजमान है, क्योंकि वह अनन्त प्रजापति के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि में रम रहा है (तसृटष्ट्वा तदेवानुपप्राविशत)। इस प्रकार, वैदिक चिन्तन ब्रह्माण्ड और पिण्ड के साम्य को स्वीकार करता है (सर्व सर्वत्र सर्वदा)।


वैदिक-पौराणिक परम्परा में अनन्त के स्तवन के दो रूपों की व्याख्या मिलती है। 1
प्रथम तो अनन्त सत्ता प्रकृति रूप एवं निराकार है, जिसे ज्ञानी तथा योगी जन ध्यान के द्वारा स्तवन करते हैं। द्वितीयत: उस अनन्त का रूप साकार ब्रह्म अथवा देवता रूप है, जिसके स्तवनार्थ देवायतनो एवं देव प्रतिमाओं की परिकल्पना की गयी है। ऐसे पूजा-वास्तु रूपों में प्रतीकों के माध्यम से उसे परम सत्ता की विद्यमानता का रूपायन किया गया है। ज्ञातव्य है कि देवायतनों अथवा मंदिरों के माध्यम से अपार्थिव स्वर्ग का पार्थिव संसार से मिलन कराने का सम्यक विधान हमारे धर्मग्रंथो एवं शिल्पग्रंथों में निरूपित मिलता है। वस्तुतः मंदिर का निर्माण भूतल पर स्वर्ग का पार्थिव अवतरण माना जा सकता हैं। मानव अनादि काल से देवत्व-प्राप्ति के लिए संघर्ष करता रहा है। एदतर्थ ही पुराणों में इष्ट तथा पूर्व कर्मों को संपन्न करने पर विशेष बल दिया गया है। पुराणों में मंदिर-निर्माण प्रक्रिया दैवत्व प्राप्ति की दिशा में पूर्त-कर्म माना गया है।
Keywords अनन्त वै वेदाः,सर्व सर्वत्र सर्वदा,पक्वेष्टका,इष्टिकान्यास,शतपथ ब्राह्मण,तैत्तिरीय संहिता,दाह- परबतिया,सिला विगड़-भिचा,सुकनासी
Field Arts
Published In Volume 8, Issue 4, July-August 2026
Published On 2026-08-10

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