International Journal For Multidisciplinary Research

E-ISSN: 2582-2160     Impact Factor: 9.24

A Widely Indexed Open Access Peer Reviewed Multidisciplinary Bi-monthly Scholarly International Journal

Call for Paper Volume 8, Issue 4 (July-August 2026) Submit your research before last 3 days of August to publish your research paper in the issue of July-August.

वृद् ध-ववमर्श के परिपेक्ष में कृष् ण बलदेव वैद कृत नाटक ‘अंत का उजाला

Author(s) Mr. Raman Kumar Sharma, Prof. Sunil
Country India
Abstract भारतीय साांस् कृततक परांपरा में प्र ाचीन काल से ही वृद् धों को समादरणीय मार्गदर्गक का स् थान प्र ाप्त रहा है।भारतीय सांस् कृतत में माता-पपता को भर्वान के समान माना र् या है। यही कारण है कक सांतान प्र ाप्प्त के ललएलोर् ऋपि-मुतनयों के आर्ीवागद हेतु यज्ञ और तपस्या ककया करते थे तथा सांतानें भी माता-पपता की आज्ञा कोसवोपरर मानकर अपने सुख-सुपवधाओां का त् यार् कर देती थीां। भारतीय इततहास और पुराणों में अनेक ऐसेउदाहरण लमलते हैं, जहााँ पुत्रों ने माता-पपता की सेवा और सम्मान के ललए राजलसांहासन तक छोड़ ददया तथाउन्हें तीथग-यात्राओां पर अपने कांधों पर बैठाकर ले र् ए। हमारे र् ास्त्र और लोकपरांपराएाँ भी बुजुर्ों के सम्मान ,अनुभव और ज्ञ ान की महत्ता को रेखाांककत करती हैं। पररवार के महत् वपूणग तनणगय उनके अनुभव औरदूरदलर् ग ता के आधार पर उनकी सहमतत से ललए जाते थे। इसी कारण वृद् धजन पररवार और समाज मेंसांस्कारों , नैततक मूल् यों तथा जीवनानुभव के प्र मुख स्र ोत माने जाते थे। ककन् तु आधुतनकता, नर्रीकरण ,भौततकवाद और पाश्चात्य सांस् कृतत के प्र भाव ने पाररवाररक मूल् यों को र् हराई से प्र भापवत ककया है। आज कीपीढी सांबांधों और पाररवाररक उत्तरदातयत्वों की अपेक्षा व् यप्ततर्त स् वतांत्रता और स् वाथग को अधधक महत्व देनेलर्ी है। पररणामस्वरूप वृद् धजन उपेक्षा , अकेलेपन, असुरक्ष ा और मानलसक पीड़ा का जीवन जीने को पववर्हो रहे हैं। अनेक बुजुर् ग अपने ही पररवारों में बोझ समझे जाने लर्े हैं, प् जससे वृद् धाश्र मों की सांख्या और उनमेंरहने वाले वृद् धों की तादाद तनरांतर बढती जा रही है। वास्तव में वृद् धावस् था केवल जैपवक पररवतगन कीअवस्था नहीां है, बप्ल्क यह सामाप्जक , आधथगक और मनोवैज्ञातनक चुनौततयों से भी र् हराई से जुड़ ी हुई है।इस अवस्था में व् यप्तत र् ारीररक रू प से कमजोर और कई बार दूसरों पर तनभगर हो जाता है, किर भी बुजुर् गसमाज के ललए अनुभव, सांस् कृतत, नैततकता और जीवन-मूल् यों के अमूल् य भांडार होते हैं। यदद उन्हें उधचतसम्मान , स् नेह और सहयोर् प्र ाप्त हो, तो वे समाज को सकारात्मक ददर्ा देने में महत् वपूणग भूलमका तनभासकते हैं। दहांदी सादहत्य में उभरता ‘वृद् ध पवमर्ग ’ इसी सामाप्जक यथाथग को केंद्र में रखता है। यह पवमर्गककसी एक वर्ग तक सीलमत न होकर समाज के सभी वृद् धजनों की समस्याओां , उनकी उपेक्षा , मानलसक सांघिग,अकेलेपन और सामाप्जक असुरक्ष ा को अलभव्यप्तत प्र दान करता है। साथ ही, यह समाज को सांवेदनर्ीलबनाते हुए वृद् धों के प्र तत सम्मान , सहानुभूतत और उत्तरदातयत्व की भावना जार्ृ त करने का कायग भी करता
है। राष्ट्रीय लर्क्षा नीतत 2020 भी चररत्र तनमागण, मानवीय मूल् यों और पाररवाररक सांवेदनाओां पर बल देते हुएवृद् धों के प्र तत सम्मान और सांवेदना पवकलसत करने की आवश्यकता को रेखाांककत करती है। इस प्र कार ‘वृद् धपवमर्ग ’ केवल सादहप्त्यक पवमर्ग नहीां, बप्ल्क मानवीय सांवेदनाओां और सामाप्जक चेतना से जुड़ ा एकमहत् वपूणग सामाप्जक सरोकार बनकर उभरता है
Keywords NA
Field Arts
Published In Volume 8, Issue 4, July-August 2026
Published On 2026-08-20
DOI https://doi.org/10.36948/ijfmr.2026.v08i04.86141

Share this